बिहार में कुष्ठ रोग के 50,000 नए मरीज़

कुष्ठ रोग को लेकर आपके मन में हो सकता है यह छवि बनी हो कि इसके शिकार ज्यादातर बुजुर्ग लोग होते हैं| मगर आंकड़े बता रहे हैं कि बच्चे इस रोग के नये शिकार बन रहे हैं| पिछले डेढ़ दशक से बिहार में कुष्ठ रोगी बच्चों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है|

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50,000 new patients suffering from leprosy in Bihar

कुष्ठ रोग को लेकर आपके मन में हो सकता है यह छवि बनी हो कि इसके शिकार ज्यादातर बुजुर्ग लोग होते हैं| मगर आंकड़े बता रहे हैं कि बच्चे इस रोग के नये शिकार बन रहे हैं| पिछले डेढ़ दशक से बिहार में कुष्ठ रोगी बच्चों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है| आंकड़े बताते हैं कि आज की तारीख में बिहार में कुष्ठ रोगी बच्चों की संख्या देश में सबसे अधिक है| जहां देश में कुष्ठ रोगी बच्चों की संख्या कुल कुष्ठ रोगियों का नौ फीसदी है| मगर बिहार में यह संख्या पिछले पंद्रह सालों से 15 फीसदी के आसपास है और तमाम कोशिशों के बावजूद सरकार इसे सामान्य स्तर पर लाने में नाकामयाब है|

बिहार के 38 जिलों में अनुसूचित जाति (SC) समुदायों के सभी लोगों के लिए लगभग 2 करोड़ लोगों का सर्वेक्षण किया गया। इस वर्ष 9 से 13 जनवरी के बीच कुष्ठ रोग का पता लगाया जाएगा|डॉ.बिजॉय कुमार पांडे, स्वास्थ्य निदेशक, स्वास्थ्य सेवाओं और राज्य कार्यक्रम अधिकारी के अनुसार लगभग 50,000 नए कुष्ठ मामलों का संकेत देते हैं।पिछले पंद्रह सालों से 15 फीसदी के आसपास है और तमाम कोशिशों के बावजूद सरकार इसे सामान्य स्तर पर लाने में नाकामयाब है| नेशनल लेप्रसी इरिडिकेशन प्रोग्राम के 2017-18  में बिहार के 38 में से 15 जिलों में प्रचलित दर 10,000 प्रति 1 से अधिक है। उदाहरण के लिए  बांका में 3.79 की प्रतिशत की दर बताई गयी है|  जिले में 779 महिलाओं सहित 1,457 नए मामले सामने आए। इनमें से 248 संक्रमित लोग एससी (sc)और 79 एसटी (st) समुदायों के हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, चिंता का मुख्य कारण 488 मल्टीबैसिलरी एमबी) मामलों का पता लगाना था| जो बीमारी का कारण बन सकता है। सुपौल जिले ने 3.07 की प्रतिशत की दर बताई गई, जिसके बाद जमुई में (2.64) प्रतिशत बताया गया है|

 यह न सिर्फ देश में सर्वाधिक है बल्कि देश के कुल 11365 कुष्ठ रोगी बच्चों का पांचवे हिस्से से भी अधिक है| यानी देश का हर पांचवां कुष्ठ रोगी बच्चा बिहार में रहता है| विशेषज्ञ इसे नये तरह का संकट मान रहे हैं| वे कहते हैं कि चूंकि बच्चों का इम्यूनिटी लेवल कम होता है इसलिए ये आसानी से संक्रमण का शिकार हो जाते हैं| हालांकि यह बात देश के दूसरे इलाकों के बारे में सच नहीं साबित हो रही है|

 कुष्ठ रोग के उन्मूलन के लिए काम करने वाली संस्था डेमियेन फाउंडेशन इंडिया ट्रस्ट (डीएफआइटी) की पटना स्थित शाखा में कार्यरत एनएलईपी, बिहार कंसल्टेंट डॉ. आशीष वाघ कहते हैं, यहां कुष्ठ रोग के प्रसार की सबसे बड़ी वजह लोगों में इस रोग के प्रति झिझक है| चूंकि समाज में इस रोग को लेकर नकारात्मक भावना है इसलिए वे अक्सर इसे छिपाने की कोशिश करते हैं और उनकी वजह से यह संक्रमण फैलता रहता है| छोटे बच्चे आसानी से इसका शिकार हो जाते हैं| जबकि अगर रोगी दवा का प्रयोग शुरू कर दे, तो बड़ी आसानी से इस रोग की भयावहता को कम किया जा सकता है और इसके प्रसार को भी रोका जा सकता है|

डॉ. वाघ कहते हैं, इसी वजह से पिछले दो साल से बिहार में राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन अभियान का संचालन हो रहा है| इस अभियान के तहत आशा कार्यकर्ता घर-घर जाकर कुष्ठ रोगियों की पहचान करती हैं और उन्हें इलाज कराने के लिए प्रेरित करती हैं| इस साल भी पांच सितंबर से 18 सितंबर तक यह अभियान चला है| इस अभियान को नजदीक से देखने वाले लोग बता रहे हैं कि इस साल भी बड़ी संख्या में शिशु रोगी मिले हैं|

हालांकि स्टेट लेप्रसी ऑफिसर विजय कुमार पांडेय इसे बड़ी समस्या नहीं मानते| वे कहते हैं कि मुख्य लक्ष्य लेप्रसी को खत्म करना है और हम इसमें जुटे हैं| एक बार लेप्रसी खत्म हो गया तो क्या बच्चे, क्या बड़े सब इस खबरे से मुक्त रहेंगे| वे अपील करते हुए कहते हैं कि इन दिनों संचालित हो रहे कुष्ठ उन्मूलन अभियान को सफल बनाने के लिए सभी को मदद करना चाहिये| अगर किसी के शरीर में कोई ऐसा पैच हो जो सुन्न पड़ गया हो तो उसे खुद आकर अस्पताल में जांच करानी चाहिए| अस्पताल में ऐसे रोगियों के लिए मुफ्त दवा उपलब्ध है और इसका उपचार मुमकिन है|

कुष्ठ रोगएक परिचय

  1. कुष्ठ एक संक्रामक रोग है जो गंभीर होने पर इनसान को विकलांग बना सकता है|
  2. कुष्ठ रोग शुरुआती दौर में तो नुकसान नहीं करता, मगर वह 5 से 40 साल की उम्र में सक्रिय होकर इनसान को विकलांग बना सकता है|
  3. कुष्ठ रोगी रोगी के सांस लेने से फैलता है. इसलिए अगर कोई कुष्ठ रोगी इलाज नहीं करा रहा है तो वह दूसरों को भी इसका शिकार बना सकता है. खास तौर पर छोटे बच्चों को|
  4. एक बार इलाज शुरू होने पर पहली दवा खाते ही रोग की संक्रमण क्षमता खत्म हो जाती है. इसलिए इलाजरत रोगी से परहेज करने की जरूरत नहीं|
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कुष्ठ रोग को लेकर आपके मन में हो सकता है यह छवि बनी हो कि इसके शिकार ज्यादातर बुजुर्ग लोग होते हैं| मगर आंकड़े बता रहे हैं कि बच्चे इस रोग के नये शिकार बन रहे हैं| पिछले डेढ़ दशक से बिहार में कुष्ठ रोगी बच्चों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है|
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THE POLICY TIMES