चार राज्यों में 85% उज्ज्वला लाभार्थी आज भी मिट्टी के चूल्हे का उपयोग करते हैं: अध्ययन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वपूर्ण योजनाओं में से एक ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ जिसकी सफलता की कहानी भारतीय जनता पार्टी अपने चुनावी प्रचार प्रसार में कर रही है| दरअसल, इस योजना की ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है| एक अध्ययन के मुताबिक आज भी ग्रामीण घरों में चूल्हा का उपयोग हो रहा है जिसमें जलाऊ लकड़ी या गोबर के केक के साथ अब ग्रामीण स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता जा रहा है|

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वपूर्ण योजनाओं में से एक ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ जिसकी सफलता की कहानी भारतीय जनता पार्टी अपने चुनावी प्रचार प्रसार में कर रही है| दरअसल, इस योजना की ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है| एक अध्ययन के मुताबिक आज भी ग्रामीण घरों में चूल्हा का उपयोग हो रहा है जिसमें जलाऊ लकड़ी या गोबर के केक के साथ अब ग्रामीण स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता जा रहा है|

‘रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर कम्पैसिनेट इकोनॉमिक्स’ के एक नए अध्ययन से पता चलता है कि बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के गाँवों में 85 फीसदी उज्ज्वला लाभार्थी अभी भी खाना पकाने के लिए ठोस ईंधन का उपयोग करते हैं जिसमें सबसे बड़ी वजह वित्तीय असमानता है| घरों में खाना पकाने के लिए उपयोग होते घरों में जलने वाले चूल्हों से घरों के अंदर वायु प्रदुषण की समस्या इन दिनों बन रही है, परिणामस्वरूप शिशु की मृत्यु हो सकती है और बाल विकास को नुकसान पहुंच सकता है| साथ ही वयस्कों, विशेष रूप से महिलाओं के बीच, इन चूल्हों पर खाना पकाने से दिल और फेफड़ों की बीमारी के खतरें बढ़ जाते है|

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सर्वेक्षण 2018 के अंत में, चार राज्यों के 11 जिलों में 1,550 घरों का एक नमूना शामिल किया गया, जिसमें सामूहिक रूप से देश की ग्रामीण आबादी का दो-पांचवां हिस्सा है| उज्ज्वला योजना, 2016 में शुरू की गई थी जिसमें मुफ्त गैस सिलेंडर, नियामक और पाइप प्रदान करके ग्रामीण परिवारों के लिए रसोई गैस कनेक्शनों को सब्सिडी देती है|

केंद्र सरकार के आंकड़ों से पता चलता है कि छह करोड़ से अधिक परिवारों को योजना के माध्यम से कनेक्शन प्राप्त हुआ है| अध्ययन के मुताबिक, सर्वेक्षण में किए गए चार राज्यों में, योजना के कारण वास्तव में एलपीजी के स्वामित्व में पर्याप्त वृद्धि हुई है जिसमें 76 फीसदी परिवारों के पास अब एलपीजी कनेक्शन का मालिक है|

सर्वेक्षणकर्ताओं ने पाया कि केवल 27 फीसदी घरों में विशेष रूप से गैस स्टोव का उपयोग किया जाता है| एक और 37 फीसदी ने चूल्हा और गैस स्टोव दोनों का उपयोग करने की सूचना दी, जबकि 36 फीसदी ने चुल्हा पर सब कुछ बनाया|

अध्ययन के मुताबिक, लगभग 53 फीसदी ने विशेष रूप से चुल्हा का उपयोग किया जबकि 32 प्रतिशत ने दोनों का उपयोग किया| उज्जवला लाभार्थी गरीब हैं, औसतन, उन परिवारों की तुलना में, जिन्होंने अपने दम पर रसोई गैस प्राप्त की| सिलेंडर को रिफिल करना उनकी मासिक खपत का एक बड़ा हिस्सा है और सिलेंडर के खाली होने के तुरंत बाद उन्हें रिफिल मिलने की संभावना कम होती है|

रिपोर्ट में कहा गया है कि उच्चतर रिफिल सब्सिडी और निगरानी से व्यवहार को बदलने में मदद मिल सकती है|

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सर्वेक्षण के ‘लैंगिक असमानता’ की भी अहम भूमिका देखि गई| सर्वेक्षणकर्ताओं ने पाया कि लगभग 70 प्रतिशत परिवार ठोस ईंधन पर कुछ भी खर्च नहीं करते हैं| जिसका अर्थ है कि एलपीजी सिलेंडर रिफिल की सापेक्ष लागत, भले ही सब्सिडी हो, कहीं अधिक है| महिलाओं को गोबर केक बनाने की अधिक संभावना होती है और जबकि पुरुषों को लकड़ी काटने की अधिक संभावना होती है| महिलाएं अक्सर इसे इकट्ठा करने और ले जाने वाली होती हैं| अध्ययन का तर्क है कि ये महिलाएं जो मुफ्त ठोस ईंधन के लिए आवश्यक अवैतनिक श्रम करती हैं, वे आमतौर पर घर में आर्थिक निर्णय लेने वाली नहीं होती हैं जो एलपीजी के उपयोग में बदलाव को रोकती हैं|

सर्वेक्षण के अधिकांश उत्तरदाताओं ने सहमति व्यक्त की कि गैस स्टोव पर खाना बनाना आसान था लेकिन यह महसूस किया कि चूल्हा पर पकाया गया भोजन विशेष रूप से रोटियां, स्वादिष्ट होती है| सर्वेक्षण में पाया गया कि 70 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने सोचा कि गैस स्टोव कुक के स्वास्थ्य के लिए बेहतर था (आमतौर पर महिला) जबकि 86 प्रतिशत से अधिक ने महसूस किया कि चूल्हा पर खाना बनाना उन लोगों के स्वास्थ्य के लिए बेहतर है| तथ्य यह है कि वायु प्रदूषण उन लोगों के लिए भी हानिकारक है जो भोजन नहीं पका रहे हैं|

Summary
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About 85% of Ujjwala beneficiaries in 4 States still use earthen stoves
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वपूर्ण योजनाओं में से एक ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ जिसकी सफलता की कहानी भारतीय जनता पार्टी अपने चुनावी प्रचार प्रसार में कर रही है| दरअसल, इस योजना की ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है| एक अध्ययन के मुताबिक आज भी ग्रामीण घरों में चूल्हा का उपयोग हो रहा है जिसमें जलाऊ लकड़ी या गोबर के केक के साथ अब ग्रामीण स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता जा रहा है|
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The Policy Times