न्याय की लम्बी डगर, 82% केस दस साल से लंबित!

भारत सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016 के अंत तक लगभग 7 लाख से अधिक मुकदमें लंबित थे| निचली अदालतों में 2.8 करोड़ से भी ज्यादा मामलें लंबित है| केवल उत्तरप्रदेश में इसका आंकड़ा 58.8 लाख है जिसमें से 43.7 लाख मामलें अपराधिक है| उच्च न्यायलयों में 82 फीसदी मामलें ऐसे है जो पिछले दस साल से ज्यादा समय से चल रहें है|

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Awaiting for Justice, 82% cases delayed more than 10 years

देश के संविधान के अनुसार न्याय पाना हर एक भारतीय का मौलिक अधिकार है|

वर्ष 1956 में देश के लंबित मुकदमों की संख्या 22 लाख थी, जो वर्ष 2012 में बढ़कर 3.5 करोड़ हो गई है| अनुमान है कि यदि न्याय की गति यही रही तो 2040 तक मुकदमों की संख्या बढ़कर 15 करोड़ हो जाएगी|

भारत सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016 के अंत तक लगभग 7 लाख से अधिक मुकदमें लंबित थे| 2016 में दिए गए आंकड़ों के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय में 62,301 एवं निचली अदालतों में 3 करोड़ से अधिक मामलें लंबित है|

भारत में लंबित मुक़दमे

आंकड़ों के मुताबिक निचली अदालतों में 2.8 करोड़ से भी ज्यादा मामलें लंबित है| केवल उत्तरप्रदेश में ही इसका आंकड़ा 58.8 लाख है जिसमें से 43.7 लाख मामलें अपराधिक है| उच्च न्यायलयों में 82 फीसदी मामलें ऐसे है जो पिछले दस साल से ज्यादा समय से चल रहें है और निचली अदालतों में करीब 5 हज़ार लंबित केस है| देश की धीमी न्यायिक व्यवस्था और लंबित मुकदमों के कारण अक्सर आरोपी अपने जीवन का अहम हिस्सा जेल में ही गुज़ार देता है और इसमें कई ऐसे केस होते है जिसमें फैसला आने के बाद मालुम होता है कि वह बेगुनाह था|

नेशनल जुडिशल डाटा ग्रिड के मुताबिक

  • देश में कूल लंबित मुकदमें 2,00,92,84 दर्ज है| सिविल मुकदमों की संख्या जहाँ 66.9 लाख है वहीँ अपराधिक मामलों की संख्या 1.34 करोड़ है| दस साल से अटके पड़े लंबित मुक़दमे 10.40 फीसदी है| पांच से दस साल लंबित मुकदमों की दर 18.02 फीसदी है, दो साल लंबित मुकदमें की दर 41.64 फीसदी है और दो से पांच साल के बीच 29.94 फीसदी लंबित केस है, जिस पर अब तक सुनवाई नहीं हुई|
  • रिपोर्ट के मुताबिक सबसे अधिक लंबित मुकदमें उत्तरप्रदेश में है|

 राज्यों में लंबित मुकदमों की दर

  1. उत्तरप्रदेश – उत्तरप्रदेश में लंबित मुकदमों की दर सबसे अधिक है| सिविल केस में 1225833 मामलें है वहीँ, क्रिमिनल केस के 3593704 मामलें है| लंबित मुकदमें की कूल संख्या 4819537 (23.76%) है|
  2. महाराष्ट्र – महाराष्ट्र लंबित मुकदमों में दुसरे स्थान पर है| सिविल केस में 1046166 मुकदमें है वहीँ, क्रिमिनल केस के 1928968 मामलें है| लंबित मुकदमों की कूल संख्या 2975135 (14.67%) है |
  3. गुजरात – गुजरात में सिविल केस के 577763 मामलें है वहीँ, क्रिमिनल केस के 1466777 मामलें है| लंबित मुकदमों की कूल संख्या 2044540 (10.08%) है |
  4. पश्चिम बंगाल – पश्चिम बंगाल में सिविल केस के कूल 435013 मामलें है वहीँ, क्रिमिनल केस 941076 है| लंबित मुकदमों की कूल संख्या 1376089 (6.78%) है |
  5. बिहार – बिहार में सिविल केस के 228837 मामलें है वहीँ, क्रिमिनल केस 1119367 है| लंबित मुकदमों की कूल संख्या 1348204 (6.65%) है |
  6. कूल लंबित केस मामलों में देश के अन्य राज्यों ( दिल्ली और मध्यप्रदेश छोड़कर) की स्थति दयनीय है| सिविल केस 6730346 और क्रिमिनल केस के मामलें कूल 13555792 है| अन्य राज्यों में लंबित मुकदमों की कूल संख्या 20286233 है |

चर्चित केस… न्याय कहाँ है?

  1. भोपाल गैस त्रासदी

यह मामला 2 दिसम्बर 1984 का है| भोपाल में यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री में मिथाइल आइसोसाइनेट (एमआईसी) गैस का एक प्रमुख रिसाव से 5 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए थे, जबकि 3,787 लोगों की मौत हो गई थी| 2014 में मदर जोन्स में पेश होने वाली एक रिपोर्ट के मुताबिक, अभी भी 1.2 लाख लोग घातक गैस के संपर्क में हैं। कई सालों से यह केस धीरे-धीरे चल रहा था लेकिन यूनियन कार्बाइड के अध्यक्ष पर मुकदमा नहीं चलाया गया था, कंपनी के सात कर्मचारियों को दो साल की सजा सुनाई गई थी और कंपनी खुद 470 मिलियन डॉलर का मुआवजा चुका रही है।

  1. उपहार सिनेमा फायर केस

यह मामला 13 जून 1997 का है| इस केस का फैसला 18 साल बाद आया| फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान सिनेमाहॉल में आग लग      गई थी जिसमें लगभग 59 लोगों की मौत हो गई थी और 100 से अधिक लोग घायल हो गए थे। वर्षों बाद, आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ितों  को मुआवजा देने पर पर अपना फैसला सुनाया। सर्वोच्च न्यायालय ने मामलें में आरोपित सगे भाइयों गोपाल और सुशिल को जेल की सजा नहीं दी बल्कि उन पर 60 करोड़ का जुर्माना लगा जो दिल्ली सरकार के खाते में जाएगा| 59 मृत और 100 घायल लोगों के लिए न्याय कहाँ है?

  1. 1984 के सिख विरोधी दंगों के मामलें

31 अक्टूबर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में कांग्रेस पार्टी के आम जनता और समर्थकों ने सिख समुदाय के खिलाफ हिंसा की। जल्द ही हिंसा भारत के कई अन्य हिस्सों में फैल गई जिसमें कुल मिलाकर, 2,800 मौतें हुईं थी, जिनमें से अकेले दिल्ली में 2,100 लोगों की मौते हुई। इतने सालों के बाद, ज्यादातर व्यक्ति अब तक स्वतंत्र हैं और आज तक, पीड़ितों को न्याय नही मिला है|

हालाँकि, ऐसे कई बहुचर्चित केस सामने आए जिसमें पीड़ितों को इन्साफ नहीं मिला है| चाहे मामला अभिनेता द्वारा किसी पर गाड़ी चढाने का हो या दादरी के अख़लाक़ का मामला हो, ये मामलें सुर्ख़ियों में रहा पर इन्साफ नहीं हुआ|

 प्रमुख समस्या

कमज़ोर न्यायिक व्यवस्था का प्रमुख कारण अपर्याप्त न्यायधीश और धीमी न्यायिक प्रणाली है| 2013 तक भारत में एक न्यायाधीश के अधीन प्रति एक लाख व्यक्ति थे| आज भारत में प्रति 10 लाख लोगों पर 17 न्यायाधीश हैं| देश में आज भी मात्र 18 हज़ार जज काम कर रहे हैं| जनसंख्या के अनुसार कम-से-कम 70 हज़ार जजों की आवश्यकता है जबकि देश भर में सिर्फ 18 हज़ार जज ही है|

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भारत सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016 के अंत तक लगभग 7 लाख से अधिक मुकदमें लंबित थे| निचली अदालतों में 2.8 करोड़ से भी ज्यादा मामलें लंबित है| केवल उत्तरप्रदेश में इसका आंकड़ा 58.8 लाख है जिसमें से 43.7 लाख मामलें अपराधिक है| उच्च न्यायलयों में 82 फीसदी मामलें ऐसे है जो पिछले दस साल से ज्यादा समय से चल रहें है|
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The Policy Times
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