राजस्थान में इन 5 कारणों से हारी बीजेपी

राजस्थान विधानसभा चुनाव की मत-गणना समाप्त हो चुकी है और नतीजे भी आ चुके है| राजस्थान में 200 में से 199 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव हुआ, सभी 199 सीटों में से कांग्रेस ने 101 सीटों पर बढ़त हासिल की वहीं बीजेपी 73 सीटों पर ही सिमट गयी। दूसरी तरफ, बसपा को 6 तथा अन्य उम्मीदवारों को 19 सीटों प्राप्त हुई|

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BJP has lost 5 of these reasons in Rajasthan
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राजस्थान विधानसभा चुनाव की मत-गणना समाप्त हो चुकी है और नतीजे भी आ चुके है| राजस्थान में 200 में से 199 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव हुआ, सभी 199 सीटों में से कांग्रेस ने 101 सीटों पर बढ़त हासिल की वहीं बीजेपी 73 सीटों पर ही सिमट गयी। दूसरी तरफ, बसपा को 6 तथा अन्य उम्मीदवारों को 19 सीटों प्राप्त हुई|

राजस्थान विधानसभा चुनावों में बीजेपी की हार का अंदेशा पहले से ही जताया जा रहा था। राज्य में जहां एक तरफ बीजेपी के खिलाफ ‘एंटी इनकंबेंसी’ का माहौल तो था ही साथ ही सीएम वसुंधरा राजे के खिलाफ बगावती सुर भी तेजी से उठने लगे थे। कार्यकर्ताओं और पार्टी के नेताओं का आरोप था कि वसुंधरा राजे मनमानी तरीके से सरकार चला रही हैं। पार्टी अध्यक्ष से भी इसकी शिकायत की गई, लेकिन वसुंधरा राजे ने अपना रवैया नही बदला।

दूसरी तरफ राज्य की बिगड़ती कानून व्यवस्था, किसानों की नाराजगी और बेरोजगारी जैसे मुद्दे भी पार्टी पर भारी पडे़। आइये जानते हैं कि आखिर ‘थार के मरुस्थल’ में बीजेपी को क्यों मुंह की खानी पड़ी।

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  1. विधानसभा चुनावों में बीजेपी की हार की सबसे बड़ी वजह खुद वसुंधरा राजे रहीं जिनका महारानी स्टाइल उनको और उनकी पार्टी दोनो को ले डूबा। कहते हैं कि पांच वर्षों तक उन्होंने ‘महारानी स्टाइल’ में सरकार चलाई और उन्हें पिछले 5 साल के दौरान लोगों के बीच जाने की जरूरत तक महसूस नही हुई। तमाम ऐसे मौक़ों पर जहां मुख्यमंत्री के आने की अपेक्षा की जाती है, वहां मंत्रियों और विधायक़ों को भेज काम चलाया गया।2013 में चुनाव जीतने के बाद से वसुंधरा राजे पार्टी के कार्यकर्ताओं से कटकर एक अलग लीक पर चली गईं। स्थानीय कार्यकर्ताओं और यहां तक कि पार्टी में ठीक-ठाक हैसियत रखने वाले नेताओं को भी उनसे मिलने के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ती थी। जिसका एक उदाहरण पार्टी के विधायक रह चुके घनश्याम तिवाड़ी हैं जिन्होंने वसुंधरा की कार्यप्रणाली से नाराज़ होकर पार्टी ही छोड़ दी।

    तमाम घटनाओं के बाद वसुंधरा पर दंभी होने के आरोप लगे इसके बावजूद भी उनके रुख में कोई बदलाव नहीं देखा गया था। चुनावी बिगुल बजने से चंद दिन पहले ही वसुंधरा राजे ने लोगों से जनसंपर्क साधना शुरू किया। जनसम्पर्क अभियान के दौरान लोगों ने राजे का विरोध कर उनको काले झंडे दिखाए। जिसका मतलब साफ था कि लोग उनसे नाराज हैं और चुनाव नतीजों ने इसकी पुष्टि कर दी|

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  2. राजस्थान में बीजेपी (BJP) की हार के पीछे ‘बागियों’ की नाराज़गी बड़ी वजह मानी जा रही है। पार्टी में टिकट बँटवारे के साथ ही टकराव की स्थिति पैदा हो गयी थी। चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अपने कैबिनेट के चार मंत्रियों सहित 11 वरिष्ठ नेताओं को निलंबित कर दिया था। ये नेता पार्टी द्वारा चुने गए उम्मीदवारों के पक्ष में राजस्थान विधानसभा चुनावों के लिए नामांकन वापस लेने से इंकार कर रहे थे। जिन लोगों को हटाया गया उनमें सुरेंद्र गोयल, लक्ष्मीनारायण दवे, राधेश्याम गंगानगर, हमी सिंह भदान, राजकुमार रिनावा, रामेश्वर भती, कुलदीप धनकड़, दीनदयाल कुमावत, किशनम नाई, धनसिंह रावत और अनीता कटारा प्रमुख थे| इसके अलावा पार्टी के दिग्गज नेताओं में शुमार रहे घनश्याम तिवाड़ी की नाराज़गी भी बीजेपी को भारी पड़ी जिन्होंने बागी तेवर अपनाते हुए बीजेपी छोड़कर भारत वाहिनी पार्टी लाँच करदी। हालांकि बगावती तेवर अपनाए बीजेपी के ज्ञानदेव आहूजा को मनाने में कामयाब रही थी, लेकिन इसके बावजूद भी नतीजे पार्टी के खिलाफ रहे।
  3. राजस्थान में मॉब लिंचिंग की घटनाओं की वजह से राज्य की कानून व्यवस्था गम्भीर सवालों के साथ ही शक के दायरे में आ गयी। लगातार एक के बाद एक होने वाली आपराधिक घटनाओं की वजह से सरकार न सिर्फ सवालों के घेरे में आई इसके साथ ही ऐसी घटनाओं को न रोक पाने की वजह से लोगों में नाराज़गी भी काफी बढ़ी थी। पहलू खान और रकबर की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या के बाद तो राजस्थान की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी खराब हुई थी इसके अलावा अवैध खनन आदि का मुद्दा भी बीजेपी पर भारी पड़ा।इन सबके अलावा बेरोज़गारी का मुद्दा भी बीजेपी सरकार पर भारी पड़ा। चुनाव प्रचार के दौरान युवाओं को यह कहते पाया गया कि राज्य में रोज़गार पैदा करने के संसाधन बहुत थे, लेकिन सरकार इस पर काम करने में विफल रही जिसकी वजह से बेरोज़गारी बढ़ी जिसके कारण युवाओं को दूसरे राज्यों में पलायन करना पड़ा।

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    इन सबके अलावा इन चुनावों में पानी का मुद्दा भी बहुत गरमाया हुआ था। बाड़मेर के अलावा पाकिस्तान से सटे जिलों के सीमावर्ती इलाकों में पानी की किल्लत की वजह से लोगों में अच्छी-ख़ासी नाराज़गी थी। चुनाव के दौरान लोगों का कहना था कि 2013 में उन्होंने पानी के लिए वसुंधरा को वोट दिया था, लेकिन जहां पांच वर्षों में पानी की व्यवस्था ठीक होनी चाहिए थी वहीं ये समस्या पानी की कालाबाजारी के रूप में बढ़ती दिखाई दी।

  4. इसी साल राजस्थान में हुए उपचुनावों में बीजेपी को करारी हार मिली थी. अजमेर, अलवर लोकसभा और मांडलगढ़ विधानसभा सीटें बीजेपी कांग्रेस से हार गई थी। उपचुनावों में हार के बाद वसुंधरा के नेतृत्व पर सवाल उठने लगे, हालांकि उन्होंने लगातार इसे नज़रअंदाज़ किया। यहां तक कि पार्टी के अंदर बगावती सुर भी उठने लगे और कई नेताओं ने तो उन्हें हटाने की मांग कर डाली। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को इसके लिए पत्र भी लिखा गया लेकिन वसुंधरा पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इसके बाद प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति में भी वसुंधरा की ही चली जिसके बाद वसुंधरा राजे की पार्टी और संगठन से दूरी बढ़ती चली गई। भले ही विधानसभा चुनाव में पीएम मोदी समेत पार्टी के तमाम शीर्ष नेता चुनावी रण में दिखे हों, लेकिन धरातल पर कार्यकर्ताओं और संगठन की नाराज़गी भारी पड़ी। संगठन की तरफ से वैसा सहयोग नहीं मिला, जैसा पिछली बार मिला था और जैसी वसुंधरा राजे को पार्टी से उम्मीद थीं।

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  5. ऐसा माना जाता है कि जिसने राजस्थान का जातीय गणित हल कर लिया समझो वो चुनाव जीत गया। साल 2013 में जिस जातीय समीकरण की वजह से वसुंधरा सीएम की गद्दी तक पहुंची थीं, इस बार वह उसी गणित को हल करने में नाकाम रहीं। एक तरफ भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता रहे मानवेन्द्र सिंह के कांग्रेस में जाने की वजह से राजपूत वोट छिटका तो दूसरी तरफ, करणी सेना की नाराज़गी का भी असर दिखा फलस्वरूप राजपूत वोटर कांग्रेस की तरफ मुड़े। इसके अलावा अशोक गहलोत की वजह से सैनी, माली और अन्य पिछड़ी जातियों का वोट तो कांग्रेस को मिला ही साथ ही सचिन पायलट की वजह से गुर्जर समुदाय का वोट भी कांग्रेस के पाले में चला गया। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि किसानों की नाराज़गी भी वसुंधरा को भारी पड़ी और किसानों का वोट भी कांग्रेस को गया।
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BJP has lost 5 of these reasons in Rajasthan
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राजस्थान विधानसभा चुनाव की मत-गणना समाप्त हो चुकी है और नतीजे भी आ चुके है| राजस्थान में 200 में से 199 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव हुआ, सभी 199 सीटों में से कांग्रेस ने 101 सीटों पर बढ़त हासिल की वहीं बीजेपी 73 सीटों पर ही सिमट गयी। दूसरी तरफ, बसपा को 6 तथा अन्य उम्मीदवारों को 19 सीटों प्राप्त हुई|
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