क्या ‘स्वास्थ्य बीमा योजना’ बदल पाएगी देश की लचर स्वास्थ्य सेवा की तस्वीर

निति आयोग के तमाम बड़े दावो के बाद भी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा’ की सफलता में कई बाधाएं है| समस्या यह है कि दूर-दराज एवं ग्रामीण अंचलों में लोगों को इस योजना से जुड़ी जानकारियाँ नहीं है|

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ये बात किसी से नहीं छिपी है कि आज भी देश के तमाम हिस्सों में स्वास्थ्य सेवा की हालत बेहतर नहीं हो पाई है| जहाँ एक ओर मोदी सरकार की ‘स्वास्थ्य बीमा योजना’ की बड़ी-बड़ी कहानियां पेश की जाती है, पर हकीकत इससे परे है|

निति आयोग के तमाम बड़े दावों के बाद भी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा’ की सफलता में कई बाधाएं है| समस्या यह है कि दूर-दराज एवं ग्रामीण अंचलों में लोगों को इस योजना से जुड़ी जानकारियाँ नहीं है| देश के स्वास्थ्य सेवा की हालत आज भी सामान है| लचर स्वास्थ्य सेवा एवं लोगों में बढती बीमारी देश की कमज़ोर हेल्थ सेवा का प्रमाण है|

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के सेंट्रल ब्यूरो आफ हेल्थ इंटेलिजेंस की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2017 के दौरान सरकार के राष्ट्रीय परीक्षण कार्यक्रम के तहत जांच से मधुमेह और हाइपरटेंशन के मरीजों की तादाद महज एक साल में दोगुनी हुई है। एक साल के दौरान कैंसर के मामलों में भी 36 फीसदी की बढ़ोतरी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक आज देश डाक्टरों की भारी कमी से जूझ रहा है।

आंकड़े बतातें है कि वर्तमान में 11,082 प्रति आबादी पर महज एक डाक्टर है, जबकि ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ के तय मानकों के मुताबिक यह अनुपात एक प्रति एक हजार (1:1000) होना चाहिए। यानी देश में यह अनुपात तय मानकों के मुकाबले 11 गुना कम है। बिहार जैसे गरीब राज्यों में तो तस्वीर और भयावह है। वहां प्रति 28,391 लोगों पर महज एक एलोपैथिक डाक्टर है। उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में भी स्वस्थ सेवा बेहतर नहीं है|

‘मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया’ के पास वर्ष 2017 तक कुल 10.41 लाख डाक्टर पंजीकृत थे। इनमें से सरकारी अस्पतालों में 1.2 लाख डाक्टर हैं। बीते साल सरकार ने संसद में बताया था कि निजी और सरकारी अस्पतालों में काम करने वाले लगभग 8.18 लाख डाक्टरों को ध्यान में रखें, तो देश में डाक्टर व मरीजों का अनुपात 1:1,612 हो सकता है। लेकिन यह तादाद भी ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ के मानक के मुकाबले कम ही है। इसका मतलब है कि तय मानक पर खरा उतरने के लिए देश को फिलहाल और पांच लाख डाक्टरों की ज़रूरत है।

लगातार बढ़ती आबादी को ध्यान में रखते हुए देश में डॉक्टरों की समस्या हर साल तेजी से बढ़ रही है। गैर-सरकारी संगठनों का दावा है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में ग्रामीण इलाकों की हालत काफी बदहाल है। वहां डाक्टरों की भारी कमी है। ज्यादातर झोला छाप डाक्टर इस कमी का फायदा उठा रहें है, वहीँ इसकी तादाद तेजी से बढ़ती जा रही है।

‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ ने वर्ष 2016 की अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि भारत में एलोपैथिक डाक्टर के तौर पर प्रैक्टिस करने वाले एक तिहाई लोगों के पास मेडिकल की डिग्री नहीं है।

देश में फिलहाल मेडिकल कालेजों में एमबीबीएस की 67 हजार सीटें हैं। इनमें से भी 13 हजार सीटें पिछले चार सालों में बढ़ी हैं। बावजूद इसके डाक्टरों की तादाद पर्याप्त नहीं है। सामाजिक संगठन मेडिकल एड के प्रवक्ता आशीष नंदी कहते हैं, “केंद्र की आयुष्मान भारत योजना ने कुछ उम्मीदें जरूर जगाई हैं, लेकिन डाक्टरों की कमी दूर नहीं होने तक खासकर ग्रामीण इलाकों में लोगों को इसका खास फायदा मिलने की उम्मीद कम ही है।

पड़ोसी देशों से पीछे भारत

स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में खर्च के मामलें में भारत अपने पड़ोसियों से भी पीछे है। इस मामलें में मालदीव (9.4%), भूटान (2.5%), श्रीलंका (1.6%) और नेपाल (1.1%) से भी पीछे है|

‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017’ में स्वास्थ्य की वस्तु में खर्च बढ़ाकर जीडीपी का 2.5 फीसदी करने का प्रस्ताव है। लेकिन भारत अब तक वर्ष 2010 में तय लक्ष्य के मुताबिक यह खर्च 2 फीसदी करने का लक्ष्य भी हासिल नहीं कर सका है। ऐसे में ढाई फीसदी का लक्ष्य हासिल करना बेमानी ही लगता है।

बीमा के सहारे इलाज कराना होगा मुश्किल: इरडा

लोगो को स्वास्थ्य बीमा से इलाज कराना परेशानियों में डाल सकता है| बीमा नियामक इरडा के नए दिशानिर्देश के अनुसार आप सिर्फ उन्हीं अस्पतालों में मेडिकल बीमा का लाभ लें सकते है जो नेशनल एक्रीडिटेशन बोर्ड फार हॉस्पिटल्स एंड हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स (एनएबीएच) से प्रमाणित होंगे। देश के सभी अस्पतालों को इरडा ने एनएबीएच में पंजीकरण के लिए एक वर्ष का वक्त दिया है। अभी देश में केवल एक फीसद अस्पताल ही एनएबीएच से प्रमाणित हैं।

भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (इरडा) ने 27 जुलाई को सभी बीमा कंपनियों और टीपीए को नया दिशानिर्देश जारी किया है। इसके अनुसार बीमा कंपनियों को ‘रजिस्ट्री ऑफ हास्पीटल्स इन द नेटवर्क ऑफ इंश्योरेंस’ (रोहिणी) में पंजीकरण कराना होगा। इस तरह से स्वास्थ्य बीमा की सुविधा देने वाली हर बीमा कंपनी और टीपीए की पूरी जानकारी रोहिणी पर देना अनिवार्य कर दिया गया है।

इरडा के नए दिशानिर्देश में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें केवल उन्हीं अस्पतालों को बीमा के तहत इलाज करने की छूट दी गई है, जिसके पास एनएबीएच का कम-से-कम इंट्री लेवल का सर्टिफिकेट हो, या फिर नेशनल क्वालिटी एश्योरेंस स्टैंडर्ड (एनक्यूएएस) का राज्य स्तरीय सर्टिफिकेट हो। यानी अब स्वास्थ्य बीमा कंपनियां केवल उन्हीं अस्पतालों में इलाज करवाने के बिल का भुगतान कर सकेंगी, जिनके पास एनएबीएच या एनक्यूएएस का सर्टिफिकेट होगा।

समस्या यह है कि पूरे देश में सरकारी और निजी अस्पतालों को मिलाकर कुल 60 हजार अस्पताल हैं। इनमें केवल 600 अस्पताल ही एनएबीएच या एनक्यूएएस से प्रमाणित है। जाहिर है देश के कई इलाके ऐसे होंगे, जहां प्रमाणित एक भी अस्पताल नहीं हो। ऐसे में वहां के लोगों के लिए स्वास्थ्य बीमा की कोई योग्यता नहीं रह जाएगी।

यही नहीं, स्वास्थ्य बीमा कराने वाले लोगों के लिए यह जानकारी रखना भी मुश्किल है कि कौन-सा अस्पताल प्रमाणित है और कौन-सा नहीं। अभी तक मरीज किसी भी निजी अस्पताल में अपना इलाज करा लेते थे और बीमा कंपनियां बीमा कवर के अनुसार अस्पताल को सीधे भुगतान कर देती थी।

वैसे इरडा ने बीमा कंपनियों और टीपीए को इन दिशानिर्देशों को लागू करने के लिए एक साल का वक्त दिया है। लेकिन एक साल के भीतर देश के 59400 अस्पतालों को सर्टिफिकेशन करना आसान काम नहीं होगा। देखना यह है कि इरडा इन व्यवहारिक परेशानियों को ध्यान में रखते हुए अपने दिशानिर्देशों में कोई ढील देती है या नहीं।

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The Policy Times
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