कनाडा ने औंग सां सू ची से वापस ली मानद नागरिकता

रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हुए अन्याय पर औंग सां सू ची की चुप्पी ने उनकी अन्तराष्ट्रीय स्तर पर छवि गिरा दी है| यही वजह है कि कभी शांति का नोबेल पुरस्कार जीतने वाली औंग सां सू ची से हिंसा के खिलाफ कोई जवाबी कारवाई न करने के कारण बड़ी-बड़ी उपाधियाँ वापस ली गई|

0
179 Views

नोबेल पुरस्कार विजेता औंग सां सू ची को वर्ष 2007 में कनाडा की मानद नागरिकता दी गई थी। म्यांमार में पिछले साल अगस्त में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हुई हिंसा में कोई जवाबी कारवाई न करने के कारण यह उपाधि वापस ली गई|

रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हुई हिंसा और नरसंहार के चलते कनाडा ने म्यांमार की नेता औंग सां सू ची को दी गई ‘मानद नागरिकता’ वापस ले ली है। इससे संबंधित एक प्रस्ताव बीते गुरुवार को कनाडा की संसद ने सर्वसम्मिति से पारित कर दिया है।

नोबेल पुरस्कार विजेता सू ची को वर्ष 2007 में कनाडा की मानद नागरिकता दी गई थी। म्यांमार में अगस्त 2017 में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हुई हिंसा में कोई जवाबी कारवाई न करने के कारण सू. ची छवि अंतराष्टीय स्तर पर काफी ख़राब हुई है| इसके मद्देनज़र कनाडा ने औंग सां सू ची से उनकी नागरिकता वापस लेने का फैसला लिया है|

दलाई लामा, नेल्सन मंडेला और नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई को भी कनाडा ने मानद नागरिकता दे रखी है।

पहले भी ली जा चुकी हैं उपाधियां

औंग सां सू ची से इससे पहले भी कई उपाधियाँ वापस ली जा चुकी है| ब्रिटेन के ग्लासगो, ऑक्सफोर्ड, न्यूकैसल और इडेनबर्ग शहरों ने म्यांमार नेता को दी मानद उपाधियां वापस ले ली हैं। कनाडा के मानवाधिकार म्यूजियम में लगे सू की के चित्र पर अंधेरा कर दिया गया है। वहीं  अमेरिका के होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूजियम औंग सां सू ची से “एली वीजल अवार्ड” वापस ले लिया था। नोबेल विजेता सू ची को 2012 में यह पुरस्कार दिया गया था। म्यूजियम की निदेशक सारा ब्लूमफील्ड ने सू की को पत्र लिखकर इस फैसले से अवगत कराया था|

वर्ष 1997 में सू ची को दिए गए ‘फ्रीडम ऑफ द सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड अवार्ड’ सम्मान वापस लिया गया| ऑक्सफोर्ड सिटी कौंसिल ने सर्वसम्मति से वर्ष 1997 में सू ची को दिए गए इस सम्मान को स्थाई रूप से हटाने के लिए वोट किया था| कौंसिल ने कहा था कि ‘जो हिंसा को लेकर अपनी आंखें मूंद लेते हैं, उन्हें यह पुरस्कार नहीं दिया जा सकता.’

रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हुए अन्याय पर औंग सां सू ची की चुप्पी ने उनकी अन्तराष्ट्रीय स्तर पर छवि गिरा दी है| यही वजह है कि कभी शांति का नोबेल पुरस्कार जीतने वाली औंग सां सू ची से हिंसा के खिलाफ कोई जवाबी कारवाई न करने के कारण बड़ी-बड़ी उपाधियाँ वापस ली गई|

नोबल पुरूस्कार विजेता औंग सां सू ची से उनके शान्ति के नोबल पुरूस्कार को वापस लिए जाने पर भी सवाल उठे थे किन्तु नोबेल पीस प्राइज फाउंडेशन का कहना है कि म्यांमार की नेता औंग सां सू ची से उनका शांति का नोबेल पुरस्कार वापस नहीं लिया जा सकता क्यूंकि यह नोबल फाउंडेशन के नियमों के खिलाफ है| साथ ही बताया कि किसी भी नोबेल पुरस्कार विजेता से उसका यह पुरस्कार वापस नहीं लिया जा सकता है|

क्या है पूरा मामला

म्यांमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हुई हिंसा के चलते औंग सां सू ची का अन्तराष्ट्रीय स्तर पर विरोध हुआ था| म्यांमार की सेना और बहुसंख्यक बौद्ध धर्म के चरमपंथियों ने अल्पसंख्यक रोहिंग्यों के साथ खुनी खेल खेला था जिसमें हज़ारों बेकसूर मुसलमानों की जाने गई थी। इस हिंसा से बचने के लिए सात लाख (700,000) से ज्यादा रोहिंग्या शरणार्थी म्यांमार से भागकर बांग्लादेश चले गए वहीँ, बांग्लादेश रोहिंग्या मुसलमानों को शरणार्थी के रूप में अभी भी स्वीकार नहीं कर रहा है। ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ ने इस हिंसा से जुड़ी एक सैटलाइट तस्वीर जारी की थी जिसमे बताया गया था कि केवल 6 हफ्तों में म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के 1,200 घरों को तोड़ दिया गया था|

भारत में भी रोहिंग्या मुसलमानों के आने के खिलाफ मांग उठ रही है जिसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी डाली गई है।

कौन हैं रोहिंग्या ?

रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में कहा जाता है कि वे मुख्य रूप से अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं| एक अनुमान के मुताबिक म्यांमार में 10 लाख रोहिंग्या मुसलमानों की आबादी है| वहां की सरकार ने इन्हें नागरिकता देने से इनकार कर दिया है, जबकि वें यहाँ पीढ़ियों से रह रहें है| रखाइन प्रांत में वर्ष 2012 से सांप्रदायिक हिंसा चल रही है। इस हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों की जानें गई हैं और एक लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं।

आज भी जर्जर कैंपो में रह रहे हैं रोहिंग्या

रोहिंग्या मुसलमान आज भी अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहें है| उनका न कोई अपना देश है और न स्थाई निवास| वे आज भी दर-दर की ठोकरें खा रहें है| आतंकवादी संगठन से लिंक होने के संदेह में अक्सर रोहिंग्या मुसलमानों को अपमानित किया जाता रहा है| उन्हें आज भी हर जगह व्यापक पैमाने पर भेदभाव और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है।

आंग सान सू की का राजनीति में दखल

म्यांमार को पहले बर्मा कहा जाता था। इसने औपनिवेशिक शासन से 1948 में आजादी पाई और म्यांमार लोकतंत्र बना लेकिन 1962 में सैन्य तख्तापलट हुआ। 1990 में लगभग 30 सालों बाद यहां चुनाव हुए। औंग सां सू ची तब सैन्य शासन के खिलाफ लड़ाई लड़ रही थीं और चुनाव में उनकी पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी जीत गई। लेकिन सेना ने चुनाव को मान्यता नहीं दी और सू ची को घर में नजरबंद कर दिया। सू ची ने लोकतंत्र की लड़ाई जारी रखी, जिसकी वजह से उन्हें 1991 में शांति का नोबल मिला।

हालाँकि कि 25 साल बाद वर्ष 2015 में म्यांमार में फिर चुनाव हुए जिसमें नोबेल विजेता औंग सां सू ची की पार्टी भारी बहुमत के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी| संवैधानिक नियमों के कारण वह चुनाव जीतने के बाद भी राष्ट्रपति नहीं बन पाई थी और उन्हें स्टेट काउंसलर का पद दिया गया|

Summary
कनाडा ने औंग सां सू ची से वापस ली मानद नागरिकता
Article Name
कनाडा ने औंग सां सू ची से वापस ली मानद नागरिकता
Description
रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हुए अन्याय पर औंग सां सू ची की चुप्पी ने उनकी अन्तराष्ट्रीय स्तर पर छवि गिरा दी है| यही वजह है कि कभी शांति का नोबेल पुरस्कार जीतने वाली औंग सां सू ची से हिंसा के खिलाफ कोई जवाबी कारवाई न करने के कारण बड़ी-बड़ी उपाधियाँ वापस ली गई|
Author
Publisher Name
The Policy Times
Publisher Logo