राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर जानकारी नहीं छिपा सकता केंद्र: उच्चतम न्यायालय

देश की उच्चतम न्यायालय ने लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता को अहमियत देते हुए कहा कि अगर यह साबित हो जाए कि किसी तरह की सूचना को रोकने से इसका खुलासा होने से ज्यादा नुकसान होता है, तो केन्द्र राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए आरटीआई अधिनियम के तहत दस्तावेजों के खुलासे को रोक नहीं सकता है|

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Centre can't withhold documents under RTI citing national security, says Supreme Court

देश की उच्चतम न्यायालय ने लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता को अहमियत देते हुए कहा कि अगर यह साबित हो जाए कि किसी तरह की सूचना को रोकने से इसका खुलासा होने से ज्यादा नुकसान होता है, तो केन्द्र राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए आरटीआई अधिनियम के तहत दस्तावेजों के खुलासे को रोक नहीं सकता है|

उच्चतम न्यायालय का कहना है कि केंद्र सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर आरटीआई या सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी देने से इनकार नहीं कर सकती है| हालांकि, फ़ैसले में ये भी कहा गया है कि ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ जानकारी मांगने भर से जानकारी मिल जाएगी| सूचना मांगने वाले को अपने तर्कों से ये साबित करना होगा कि ऐसी जानकारी छिपाना, जानकारी देने से ज़्यादा नुक़सानदेह हो सकता है|

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न्यायमूर्ति के एम जोसेफ ने अपने 38 पृष्ठ में राफेल लड़ाकू विमान सौदा मामले में अपने फैसले पर पुनर्विचार के लिए लीक दस्तावेजों को आधार बनाने की अनुमति दी लेकिन सहमति वाले और उन दस्तावेजों पर ‘विशेषाधिकार’ होने की केंद्र की प्रारंभिक आपत्तियों को खारिज कर दिया|

राफेल मामले में प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा कि न्यायमूर्ति जोसफ ने उनके द्वारा सुनाए गए फैसले से सहमति जताई है लेकिन उन्होंने अपनी तरफ से अलग कारण बताए हैं| न्यायमूर्ति जोसेफ ने कहा कि धारा 8(2) के माध्यम से आरटीआई अधिनियम ने नागरिकों को यह अमूल्य अधिकार दिया है कि जिसके तहत वे कुछ मामलों जैसे देश की सुरक्षा और विदेशों के साथ संबंधों से जुड़े मामलों में भी जानकारी मांग सकते हैं|

न्यायमूर्ति जोसेफ ने कहा की इसमें कोई संदेह नहीं है कि जानकारी केवल मांगने के लिए नहीं दी जानी चाहिए| आवेदक को यह सिद्ध करना चाहिए इस तरह की सूचना को रोककर रखने से इसका खुलासा होने से ज्यादा नुकसान होता है| न्यायमूर्ति जोसेफ ने कहा कि आरटीआई अधिनियम की धारा 24 भ्रष्टाचार और मानवाधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ अभियान से जुड़े महत्व पर प्रकाश डालती है|

उन्होंने कहा कि एक नागरिक आरटीआई अधिनियम के तहत एक दस्तावेज की प्रमाणित प्रति प्राप्त कर सकता है| इसके साथ ही अगर अदालत के समक्ष ऐसा कोई दस्तावेज पेश किया जाता है तो निश्चित रूप से सरकार द्वारा विशेषाधिकार का दावा नहीं किया जा सकता है|

लोकतंत्र के लिए प्रेस की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण

जस्टिस जोसेफ ने कहा है कि भारत में मीडिया ने लोकतंत्र की मजबूती में बहुत योगदान दिया है और देश में एक जीवंत लोकतंत्र के लिए प्रेस की हमेशा एक महत्वपूर्ण भूमिका होगी| उन्होंने कहा कि विजुअल मीडिया काफी ताकतवर है और इसकी पहुंच काफी दूर तक है| जनसंख्या का कोई भी हिस्सा इसके प्रभाव से अछूता नहीं है|

जस्टिस जोसेफ ने आगे कहा कि डर, एक पत्रकार को प्रिय लगने वाली सभी चीजों या किसी भी चीज को खोने का हो सकता है| एक आजाद व्यक्ति पक्षपात नहीं कर सकता है| पक्षपात कई तरीकों का होता है| पक्षपात के खिलाफ नियम जजों द्वारा देखा गया एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है| फैसले में कहा गया है कि विजुअल मीडिया समेत हर तरीके का प्रेस पक्षपात नहीं कर सकता बल्कि उसे स्वतंत्र रहना चाहिए|

जस्टिस जोसफ ने प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतंत्र पर अपनी बात रखते हुए कहा कि देश के जीवंत लोकतंत्र बरकरार रखने में प्रेस की भूमिका निर्णायक रही है| खबरें सही होनी चाहिए और पक्षपाती नहीं होनी चाहिए|

जस्टिस जोसफ ने कहा है कि प्रेस को भयमुक्त रहना चाहिए और निष्पक्ष होना चाहिए| व्यक्तिगत, राजनीतिक या आर्थिक स्वार्थ के लिए पक्षपातपूर्ण खबरे नहीं दी जानी चाहिए| अगर जिम्मेदारी के साथ प्रेस अपने अधिकार का इस्तेमाल नहीं करेगा तो इससे लोकतंत्र कमजोर पड़ जाएगा|

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गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम के फैसले को सुचना के अधिकार के दायरे में लाने का विवाद गर्म है| इस मामले पर पीठ का कहना था कि कोई भी व्यवस्था को अपारदर्शी रखने का पक्षधर नहीं है लेकिन पारदर्शिता के नाम पर संस्था को नष्ट नहीं किया जा सकता|

वहीँ इस विवाद पर वकील प्रशांत भूषण का कहना था कि न्यायाधीश किसी अलग दुनिया में नहीं रहते| यहां तक कि केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में क्या-क्या हुआ यह भी पारदर्शिता कानून के तहत आता है|

उन्होंने कहा कि जब न्यायाधीशों का मामला आता है तब उन्हें इससे बाहर रखा जाता है| इस तरह से जजों के चयन की प्रक्रिया जनता की नजरों से दूर रहती है| यह तो पारदर्शिता नहीं हुई|

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देश की उच्चतम न्यायालय ने लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता को अहमियत देते हुए कहा कि अगर यह साबित हो जाए कि किसी तरह की सूचना को रोकने से इसका खुलासा होने से ज्यादा नुकसान होता है, तो केन्द्र राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए आरटीआई अधिनियम के तहत दस्तावेजों के खुलासे को रोक नहीं सकता है|
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The Policy Times

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