शिक्षा को ‘राष्ट्रीयकरण’ की ज़रूरत…

दिल्ली एनसीआर के स्कूलों में नर्सरी में दाखिले को लेकर अफरातफरी का माहौल है। कुछ लोग सरकार द्वारा तय मापदंडों का पालन न होने से दुखी है तो वहीँ, फार्मों की मनमानी कीमतों को लेकर असंतोष है।

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Education needs 'nationalization' ...
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‘विश्व बैंक’ के रिपोर्ट के अनुसार भारत में 6 से 10 साल के 3 करोड़ 20 लाख बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में शिक्षा को लेकर कई बच्चे भेदभाव का शिकार होते है|

दिल्ली एनसीआर के स्कूलों में नर्सरी में दाखिले को लेकर अफरातफरी का माहौल है। कुछ लोग सरकार द्वारा तय मापदंडों का पालन न होने से दुखी है तो वहीँ, फार्मों की मनमानी कीमतों को लेकर असंतोष है। स्थिति यह की स्कूल में दाखिले को लेकर आरटीई (शिक्षा का अधिकार) अधिनियम के तहत कई महीनों से हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मुकदमें चल रहें है|

देश में स्कूल की शिक्षा पर सरकार काफी खर्च कर रही है लेकिन इसका असर होता नहीं दिख रहा। दिल्ली सरकार नर्सरी में दाखिले को लेकर अपना नियम तो लागू करना चाहती है, लेकिन यहाँ उनका एक भी नर्सरी स्कूल नहीं है। देश में आज भी 75 प्रतिशत प्राइमरी स्कूल सरकारी है| साथ ही वहां की बदहाल शिक्षा के कारण 45 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे पांचवी कक्षा से आगे बढ़ने के योग्य नहीं बन पाते।

दिल्ली से सटे गाजियाबाद के कई नामचीन स्कूलों में फ़ीस बढ़ने का झंझट अब पुलिस थाना तक पहुंच चूका है। स्कूल बच्चों को परेशान  कर रहा  है जिससे अभिभावक भी पुलिस ठाणे जाकर स्कूल के खिलाफ गुहार लगा रहें है। इस मारामारी में मध्यवर्ग के लोग काफी परेशान है। माहौल ऐसा बन गया है कि बच्चों के मन से स्कूल और शिक्षा के प्रति इच्छा और उम्मीद अब खो रही है।

यह शिक्षा का व्यवसायीकरण का अंजाम है। आज शिक्षा व्यवस्था आराजकता के ऐसे गलियारों में खड़ी है, जहाँ से एक अच्छा नागरिक बनने की उम्मीद कम नज़र आती है| ऐसे में एक ही विकल्प है सबको ‘सामान शिक्षा’।

कहा जाता है कि पूर्व में ज्ञान का अधिकार केवल उच्च वर्ग के लोगों के पास हुआ करता था। लेकिन आज के मुक्त अर्थव्यवस्था से जिस नए पूंजीवाद का जन्म हो रहा है, उस पर चारो ओर चुप्पी है। अगर आप धनवान है तो शिक्षा ले सकते है, वरना सरकार और समाज की नज़र में आप कहीं के नहीं है।

आज के दौर में शिक्षा लोगों का स्तर तय कर रही है। एक तरफ कंप्यूटर, एयर कंडीशनर, खिलौनों से सजा हुआ स्कूल है, तो दूसरी ओर सरकारी स्कुल में बच्चे शौचालय और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए भी तरसते है। आज के समय में दो-तीन वर्ष के बच्चों का प्री-स्कूल में दाखिला लेना कठिन हो गया है।

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‘इंडियन एक्सप्रेस’ के खबर के मुताबिक, अठारह साल पहले केंद्र सरकार के कर्मचारियों के पांचवे वेतन आयोग के समय दिल्ली सरकार ने फ़ीस बढ़ोतरी के मुद्दे पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय से अवकाश प्राप्त सचिव जेवी राघवन की अध्यक्षता में 9 सदस्यों की एक समिति गठित की थी। इस समिति ने ‘दिल्ली स्कूल अधिनियम 1973’ में संशोधन की सिफारिश की थी।

समिति का सुझाव था कि पब्लिक स्कूलों को लाभ-हानि के बगैर संचालित किया जाना चाहिए। समिति का कहना है की स्कूल प्रबंधन छात्रों से ज्यादा फ़ीस लेकर अपने दूसरे कार्यों में प्रयोग कर रहे है। समिति ने ऐसे स्कूलों के प्रबंधन के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की अनुशंसा की थी।

समिति ने सुझाव दिया था कि छात्रों से वसूले पैसे केवल छात्रों और शिक्षकों पर किए जाए। सरकारी शिक्षा पूरी तरह से ठप हो चुकी है। निर्धारित पाठ्यक्रम की पुस्तकें जरुरत के अनुसार उपलब्ध करने में एनसीइआरटी (NCERT) सरकारी संस्था पूरी तरह से नाकाम रही है। जबकि प्राइवेट स्कूल अपनी किताब छपवा कर कोर्स में लगा रहे है। यह व्यवसाय इतना फायदे का बन गया है कि अब ग्रामीण इलाकों में भी पब्लिक स्कूल खुल रहे है। कच्ची झोपड़ियों गन्दगी के बीच बिना किसी व्यवस्था के कुछ बेरोजगार एक बोर्ड लगा कर प्राइमरी स्कूल खोल लेते है। इन स्कूलों में केवल वें बच्चे जा पाते है जिनकी आर्थिक स्थति थोड़ी बेहतर होती है और वें अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में भेजने से कतराते है। कुल मिलाकर दोष सरकारी व्यवस्था के कामकाज पर जाता है, जो अब धीरे-धीरे आम आदमी का विश्वास खोती जा रही है। लोग भूल चुके है कि दसवी पंचवर्षीय योजना के समापन तक यानी वर्ष 2007 तक शत-प्रतिशत बच्चों को प्राथमिक शिक्षा का सपना बुना गया था, जिसे ध्वस्त हुए 9 साल बीत चुके है।

रिपोर्ट के अनुसार 10 साल के सभी बच्चों को स्कूल भेजने के लिए 13 लाख कमरे बनवाने की ज़रूरत है| साथ ही 740 हज़ार नए शिक्षकों की जरुरत है। सरकार के पास शिक्षा के लिए बजट है परन्तु उसको गबन करने के लिए सरकारी दलाल भी है। लेकिन मूल समस्या स्कूली शिक्षा में असमानता की है। शिक्षा के प्राथमिक स्तर की शिक्षण संस्थाओं की संख्या बढ़ना अच्छा है, लेकिन देश के भविष्य की नैतिक शिक्षा का पहला आदर्श शिक्षक होता है| आज बच्चों से क्प्म्पुटर सिखाने के नाम पर मनमानी फीस वसूली जाती है|

यह अब ज़रूरी है कि प्राइवेट स्कूलों की आय की जाँच, सरकारी नियंत्रण, पाठ्यक्रम, पुस्तकों का एकरूपीकरण, अन्य सुविधाएं, आला सरकारी अफसरों और जनप्रतिनिधियों के बच्चों की शिक्षा सरकारी स्कूलों में अनिवार्यता, साथ ही प्राइवेट संस्था के शिक्षकों का वेतन सुनिश्चित की जाए|

अतुल्य भारत के सपनोँ को साकार करने का मूल ‘प्राथमिक शिक्षा’ है| इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए स्कूली शिक्षा का राष्ट्रीयकरण होना ज़रूरी है| इसके साथ ही विद्यालयों में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होना भी ज़रूरी है|

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दिल्ली एनसीआर के स्कूलों में नर्सरी में दाखिले को लेकर अफरातफरी का माहौल है। कुछ लोग सरकार द्वारा तय मापदंडों का पालन न होने से दुखी है तो वहीँ, फार्मों की मनमानी कीमतों को लेकर असंतोष है।
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The Policy Times
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