मीडिया की आजादी पर भारत दो पायदान निचे खिसका, पिछले 5 सालों में पत्रकारों पर हमले बढ़े: रिपोर्ट

हमारे सहयोगी और सीनियर पत्रकार सरफ़राज़ नसीर का कहना है कि पिछले कुछ सालों में न सिर्फ पत्रकार बल्कि लेखकों और बुद्धिजीवियों को भी निशाना बनाया गया है| जो पत्रकार या लेखक सरकार की आलोचना या अंधविश्वास विरोधी लिखने का साहस किया उनकी रहस्यमय ढंग से हत्या कर दी गई|

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Highlights:

  • वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2019 में भारत 2 पायदान नीचे खिसका, 180 देशों में 140वें स्थान पर|
  • नॉर्वे लगातार तीसरे साल पहले पायदान पर है जबकि फिनलैंड दूसरे स्थान पर है|
  • भारत में 2019 के आम चुनाव के दौरान सत्तारूढ़ भाजपा के समर्थकों द्वारा पत्रकारों पर हमले बढ़े हैं|
  • भारत के संदर्भ में हिंदुत्व को नाराज करने वाले विषयों पर बोलने या लिखने वाले पत्रकारों के खिलाफ सोशल मीडिया पर घृणित अभियानों पर चिंता जताई गई है|
  • साल 2018 में अपने काम की वजह से भारत में कम से कम छह पत्रकारों की जान गई है|

मीडिया की आजादी से सबंधित रिपोर्ट गुरुवार को पेश हुई जिसमे भारत दो पायदान निचे खिसक गया है| अब 180 देशों में भारत 140वें स्थान पर है| इस रिपोर्ट में यह कहा गया कि भारत में चुनाव प्रचार का दौर पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक है| चुनाव प्रचार के वक्त पत्रकार सबसे ज्यादा खतरे में होते हैं|

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इस रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनियाभर के पत्रकारों के प्रति हिंसा और दुश्मनी की भावना बढ़ी है| इस वजह से भारत में बीते साल अपने काम की वजह से कम से कम छह पत्रकारों की हत्या कर दी गई|

पत्रकारों के खिलाफ हिंसा में- पुलिस की हिंसा, नक्सलियों के हमले, अपराधी समूहों या भ्रष्ट राजनीतिज्ञों का प्रतिशोध शामिल है|

2018 में 6 पत्रकारों की जाने गई

रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2018 में अपने काम की वजह से भारत में कम से कम छह पत्रकारों की जान गई है| इसमें कहा गया है कि ये हत्याएं बताती हैं कि भारतीय पत्रकार कई खतरों का सामना करते हैं| खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में गैर अंग्रेजी भाषी मीडिया के लिए काम करने वाले पत्रकार|

2019 लोकसभा चुनाव के दौरान पत्रकारों पर हमले बढ़े

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 2019 के आम चुनाव के दौरान सत्तारूढ़ भाजपा के समर्थकों द्वारा पत्रकारों पर हमले बढ़े हैं| 2019 के सूचकांक में संगठन ने पाया कि पत्रकारों के खिलाफ घृणा हिंसा में बदल गई है जिससे दुनियाभर में डर बढ़ा है|

रिपोर्ट में भारत के संदर्भ में हिंदुत्व को नाराज करने वाले विषयों पर बोलने या लिखने वाले पत्रकारों के खिलाफ सोशल मीडिया पर घृणित अभियानों पर चिंता जताई गई है| रिपोर्ट में कहा गया है कि जब महिलाओं को निशाना बनाया जाता है तो यह अभियान ज्यादा उग्र हो जाता है|

संवेदनशील क्षेत्रों में रिपोर्टिंग करना मुश्किल

रिपोर्ट में यह कहा गया है कि जिन क्षेत्रों को प्रशासन संवेदनशील मानता है वहां रिपोर्टिंग करना बहुत मुश्किल है, जैसे कश्मीर| दक्षिण एशिया से प्रेस की आजादी के मामले में पाकिस्तान तीन पायदान लुढ़कर 142वें स्थान पर है जबकि बांग्लादेश चार पायदान लुढ़कर 150वें स्थान पर है|

वहीँ, नॉर्वे लगातार तीसरे साल पहले पायदान पर है जबकि फिनलैंड दूसरे स्थान पर है| पेरिस स्थित रिपोर्टर्स सैन्स फ्रंटियर्स (आरएसएफ) या रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स एक गैर लाभकारी संगठन है जो दुनियाभर के पत्रकारों पर हमलों का दस्तावेजीकरण करता है|

सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों पर हमले बढ़े

‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स या रिपोर्टर्स सां फ्रांतिए’(आरएसएफ़) दुनिया की जानी-मानी संस्था है जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पत्रकारिता की स्वतंत्रता की स्थिति पर सालाना रिपोर्ट जारी करती है| आरएसएफ़ का निष्कर्ष है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक चुनाव से पहले पत्रकारों के ख़िलाफ़

बहुत आक्रामकता दिखा रहे हैं| हिंदुत्व के समर्थक राष्ट्रीय बहसों से उन सभी विचारों को मिटा देना चाहते हैं जिन्हें वे राष्ट्र विरोधी मानते हैं| पत्रकारों की आवाज़ दबाए जाने के बारे में रिपोर्ट कहती है कि सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों के खिलाफ़ आपराधिक मामले दर्ज किए जाते हैं| कुछ मामलों में तो राजद्रोह का केस दर्ज किया जाता है जिसमें आजीवन कारावास की सज़ा हो सकती है|

सरकार की आलोचना करने पर पत्रकारों को चैनल से निकाला

पिछले कुछ सालों से नियोजित रूप से मीडिया की स्वतंत्रता के खिलाफ नफरत और हिंसा की घटनाएं सामने आ रही है| 2014 के बाद से जिस प्राकार से सत्तारोहण के तुरन्त बाद गोडसे, घर-वापसी, लव जिहाद और गो-रक्षा जैसे तमाम मुद्दों को उझाला गया और जिस तरह फेक खबरों और पत्रकारों के खिलाफ नफरत का एजेंडा चलाया गया ऐसा पहले कभी किसी सरकार में नहीं देखा गया|

हैरान करने वाली घटनाएं तब देखी गई जब कुछ पत्रकारों को न्यूज़ चैनल से निकाल दिया गया या उन्हें इस्तीफा देने को मजबूर किया गया| उदहारण के रूप में जब एक ख़बर को लेकर एबीपी न्यूज़ के सम्पादक मिलिंद खांडेकर से इस्तीफा लिया गया और अभिसार शर्मा को भी अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा| इसके साथ ही पुण्य प्रसून वाजपयी को भी न्यूज़ चैनल से हटा दिया गया| उनके शो ‘मास्टरस्ट्रोक’ को पिछले कुछ दिनों से रहस्यमय ढंग से बाधित किया जा रहा था|

चौबीस सालों में 70 पत्रकारों की हत्या

‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स’के अनुसार, 1992 से 2016 तक भारत में 70 पत्रकार मारे गए| 26 जुलाई, 2017 को गृह राज्य मंत्री हंसराज गंगाराम अहीर द्वारा राज्यसभा को दिए गए उत्तर में एनसीआरबी के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि पत्रकारों पर 142 हमलों के खिलाफ 73 अपराधियों को गिरफ्तार किया गया था|

उत्तर प्रदेश (यूपी) ने दो साल में सबसे अधिक मामले (64) दर्ज किए गए लेकिन केवल चार लोगों को गिरफ्तार किया गया है| यूपी के बाद मध्य प्रदेश (26) और बिहार (22) का स्थान रहा|

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प्रेस स्वतंत्रता के हिसाब से पहले दस देशों में एशिया या अफ़्रीका का एक भी देश नहीं है| ज़्यादातर देश यूरोप के हैं| सीरिया, सूडान, चीन, इरीट्रिया, उत्तर कोरिया और तुर्कमेनिस्तान अंतिम पांच में हैं|

हमारे सहयोगी और सीनियर पत्रकार सरफ़राज़ नसीर का कहना है कि पिछले कुछ सालों में न सिर्फ पत्रकार बल्कि लेखकों और बुद्धिजीवियों को भी निशाना बनाया गया है| जो पत्रकार या लेखक सरकार की आलोचना या अंधविश्वास विरोधी लिखने का साहस किया उनकी रहस्यमय ढंग से हत्या कर दी गई| उदहारण के रूप में वरिष्ठ पत्रकार और दक्षिणपंथी विचारधारा की आलोचक गौरी लंकेश, अंधविश्वास-विरोधी आंदोलन के नेता नरेंद्र दाबोलकर, कम्युनिस्ट विचारक गोविन्द पानसारे, तर्कवादी विचारक एमएम कुलबर्गी ऐसे कई तमाम लेखक और पत्रकार है जिन्हें सच लिखने पर मौत के घाट उतारा गया| इन सारी हत्याओं के पीछे एक सामान वजह थी ये सारे अपराधी हिन्दू संगठन से जुड़े हुए थे| यह हमारे देश के लिए शर्मनाक है और साथ ही चिंताजनक भी है कि आज भारत जैसे एक लोकतांत्रिक देश, जहाँ हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति की सामान आजादी है ऐसे देश में इस तरह की घटनाएं शर्मसार करने वाली है|

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freedom of the media
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हमारे सहयोगी और सीनियर पत्रकार सरफ़राज़ नसीर का कहना है कि पिछले कुछ सालों में न सिर्फ पत्रकार बल्कि लेखकों और बुद्धिजीवियों को भी निशाना बनाया गया है| जो पत्रकार या लेखक सरकार की आलोचना या अंधविश्वास विरोधी लिखने का साहस किया उनकी रहस्यमय ढंग से हत्या कर दी गई|
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The Policy Times