जादव पायेंग ने 550 हेक्टेयर बंजर ज़मीं को वन में तब्दील क्या

जादव पायेंग ने 1200 एकड़ का जंगल खड़ा करके न सिर्फ हजारों जंगली जानवरों को एक बसेरादिया है बल्कि पर्यावरण संरक्षण की एक अनोखी मिसाल भी कायम की है। तबाही अक्सर लोगों की हिम्मत तोड़ देती है। लेकिन जिंदगी का काम है आगे बढ़ना सो मजबूरी में लोगों को अपने ढर्रे पर लौटना होता है। लेकिन कुछ दुर्लभ लोग होते हैं जो तबाही से जूझने के बाद इस तरह आगे बढ़ते हैं कि उनका ही नहीं, न जाने कितनों का जीवन सकारात्मक रूप से बदल जाता है।

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Jadav Payeng converted 550 hectare of Dry land into Forest
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जादव पायेंग ने 1200 एकड़ का जंगल खड़ा करके न सिर्फ हजारों जंगली जानवरों को एक बसेरादिया है बल्कि पर्यावरण संरक्षण की एक अनोखी मिसाल भी कायम की है। तबाही अक्सर लोगों की हिम्मत तोड़ देती है। लेकिन जिंदगी का काम है आगे बढ़ना सो मजबूरी में लोगों को अपने ढर्रे पर लौटना होता है। लेकिन कुछ दुर्लभ लोग होते हैं जो तबाही से जूझने के बाद इस तरह आगे बढ़ते हैं कि उनका ही नहीं, न जाने कितनों का जीवन सकारात्मक रूप से बदल जाता है।

असम के जोरहाट जिले में रहने वाले जादव पायेंग इन्हीं इक्का दुक्का लोगों में से हैं। पायेंग ने ब्रह्मपुत्र के किनारे अरुणा सपोरी गांव के पास अपने दम पर 1200 एकड़ में एक जंगल खड़ा किया है। जादव इसके मालिक नहीं हैं। यहां के असली मालिक हैं हिरण, हाथी, दूसरे जंगली जानवर और कभी-कभार यहां डेरा जमाने वाले बाघ। जादव को अपने इस काम के लिए कुछ समय पहले पद्मश्री पुरस्कार से भी नवाजा गया है। जादव अपने मिशन में कामयाब तो हो रहे थे लेकिन अब नई तरह की समस्या आ गई। जंगल में रहने वाले हाथियों ने आसपास के गांवों में घुसना शुरू कर दिया।

जैसे लोगों को एक घर बनाने में जिंदगी लग जाती है कुछ वैसे ही तरह-तरह के जानवरों का यह बसेरा आबाद करने में भी जादव को 35 साल लगे। इस मुहिम की शुरुआत भी एक तबाही से हुई। असम में 1979 के दौरान भयंकर बाढ़ आई थी। उस समय 14-15 साल के जादव ने देखा कि ब्रह्मपुत्र के किनारे कई जानवर मारे गए। सैकड़ों मरे हुए सांप रेत पर आ गए थे और भूमि कटाव के चलते आसपास की पूरी हरियाली नदी ने निगल ली थी. बी .हरियाली गई तो वहां के पशु पक्षियों का बसेरा छिन गया। इस घटना ने जादव के मन पर काफी असर डाला। वे एक अखबार से बात करते हुए कहते हैं, मुझे लगा कि एक दिन हम इंसानों की दशा भी ऐसी हो सकती है।

जादव इस घटना से फिक्रमंद थे। इस किशोर को समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा दोबारा न हो इसके लिए वह क्या करे। इसके लिए वे अपने गांव के बड़े-बुजुर्गों से मिले। इन लोगों ने जादव को समझाया कि यदि ब्रह्मपुत्र के आसपास और बीच में उभर आईं रेतीली पट्टियों पर पेड़ हों तो नदी के कोप से जानवर भी बच सकेंगे और इंसान भी। पेड़ कौन-सा होना चाहिए?’ जादव ने तुरंत पूछा। उन्हें जवाब मिला कि इन जगहों पर बांस लगाया जा सकता है। इस किशोर के जेहन में अब कोई संशय नहीं था।  उसे रास्ता सूझ गया था। जादव ने अपने गांव से बांस के कुछ पौधे इकट्ठे किए और उन्हें ब्रह्मपुत्र के बीच बने एक टापू पर रोप आए।

हाईस्कूल में पढ़ रहे जादव ने इसके बाद पढ़ाई छोड़ दी और ज्यादातर समय इस टापू पर ही रहने लगे। वे सुबह शाम इन पौधों को पानी देते और हर दिन कुछ नए पौधे लगाते। कुछ ही सालों में यहां बांस का एक जंगल बन गया। जादव बताते हैं, ‘एक समय के बाद मैंने यहां दूसरे पेड़ लगाना शुरू कर दिए। जमीन उपजाऊ बनी रहे इसके लिए गांव से सड़ी-गली पत्तियां और केंचुए लाकर यहां छोड़ता था, और कुछ साल बीते तो इस जंगल में दूसरे पेड़ भी घने हो गए। आसपास से पशु-पक्षी यहां आने लगे. जादव कहते हैं, इस जंगल में पशु पक्षियों को देखकर मुझे जो खुशी महसूस हुई उसकी कोई तुलना नहीं की जा सकती। मैं उदयपुर पैलेस में चार-पांच दिन तक रह चुका हूं। यहां राजपरिवार के साथ खाना खाया है लेकिन वैसा माहौल भी इस खुशी के सामने कुछ नहीं है।

जादव का काम पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में यह बहुत बड़ी पहल है। लेकिन हैरानी की बात है कि देश-दुनिया को इसबारे में पांच साल पहले ही पता चला। जादव अपने मिशन में कामयाब तो हो रहे थे लेकिन अब नई तरह की समस्या आ रही थी। जंगल में रहने वाले हाथियों ने आसपास के गांवों में घुसना शुरू कर दिया था। वे यहां फसलों को बर्बाद करने लगे. कभी-कभार बाघ भी गांवों में आ जाते। इससे गुस्साए ग्रामीणों ने जादव से कह दिया कि यदि जानवरों ने गांव में घुसना बंद नहीं किया तो वे जंगल में आग लगा देंगे। जादव ने इसका भी उपाय खोज लिया। उन्होंने अब जंगल में केले के पेड़ लगाने शुरु कर दिए। इसका नतीजा यह हुआ कि हाथियों को उनका पसंदीदा आहार जंगल में ही मिलने लगा और उन्होंने गांवों की तरफ रुख करना छोड़ दिया। जंगल में हिरणों की आबादी बढ़ी तो बाघ भी वहीं सीमित हो गए।

समस्या सिर्फ इसी मोर्चे पर नहीं थी. जादव को अपने परिवार के लिए आजीविका भी कमानी थी। उन्हें जंगल से प्यार था और वे इससे दूर नहीं जाना चाहते थे सो उन्होंने दुधारु पशु रख लिए। आज वे और उनकी पत्नी व तीनों बच्चे आसपास के गांवों में दूध बेचकर अपना जीवनयापन करते हैं। जादव का काम पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में यह बहुत बड़ी पहल है। लेकिन हैरानी की बात है कि देश-दुनिया को इसबारे में पांच साल पहले ही पता चला। इसे पीछे भी बड़ी मजेदार कहानी है। 2009 जीतू कालिता नाम के एक पत्रकार जोरहाट जिले में ही पड़ने वाले नदी द्वीप माजुली पर एक स्टोरी करने आए थे। उन्हें किसी ने बताया कि 20 किमी दूर एक व्यक्ति ने जंगल लगाया है। कालिता को बड़ी हैरानी हुई कि इस रेतीली जमीन पर कोई कैसे जंगल लगा सकता है। इसी बात को समझने के लिए वे जंगल पहुंच गए। यहां वे पेड़-पौधों को देखते हुए आगे बढ़ रहे थे कि अचानक उन्हें लगा कोई उनका पीछा कर रहा है। पीछे मुड़कर उन्होंने देखा तो ये जादव थे। जादव बताते हैं, ‘मुझे लगा कहीं इस आदमी पर कोई जंगली जानवर हमला न कर दे इसलिए मैं उनके पीछे-पीछे चलने लगा। इसके बाद जोरहाट के इस स्थानीय पत्रकार को जंगल की पूरी कहानी पता चली और फिर देश-विदेश के लोगों ने भी जादव और उनकी मुहिम के बारे में जाना।

पिछले पांच सालों में जादव देश के बड़े-बड़े शहरों में आयोजित सेमिनारों और बैठकों में भाग ले चुके हैं। यहां तक कि अपने अनुभव बांटने के लिए वे फ्रांस का दौरा भी कर चुके हैं। उनके ऊपर कई डॉक्यूमेंटरी फिल्में भी बन चुकी हैं। एक कनाडाई फिल्मकार मैकमास्टर ने उनके ऊपर ‘फॉरेस्ट मैन’ नाम से डॉक्यूमेंटरी बनाई है। यह फिल्म 2014 में रिलीज हुई और इसे कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं। एक मीडिया रिपोर्ट में मैकमास्टर कहते हैं, ‘जब मैं वहां गया तो मुझे भरोसा ही नहीं हुआ कि कोई एक आदमी इतने सारे पेड़ लगा सकता है। लेकिन पायेंग के साथ जंगल में और भीतर गया तो देखा वहां बड़े-बड़े पेड़ एक लाइन में और बराबर दूरी पर खड़े थे। यह तो सिर्फ कोई आदमी ही कर सकता है। तब मैं बस चमत्कार की तरह उस जंगल को निहारता रहा।

पिछले दिनों आए कई अध्ययनों में कहा गया है कि ब्रह्मपुत्र का सबसे बड़ा नदी द्वीप माजुलि 15-20 सालों में भूमि कटाव के चलते नदी में समा जाएगा। यदि माजुली पर घना जंगल हो तो इसे बचाना मुमकिन है। जादव सिर्फ हाईस्कूल तक पढ़े हैं लेकिन इन यात्राओं और बड़े-बड़े लोगों से मेल-मुलाकातों उन्हें काफी समझदार पर्यावरणविद बना दिया है। वे अपनी बातों में ग्लोबल वार्मिंग, इसके दुष्प्रभाव, इकोलॉजी जैसी बातों को न सिर्फ समझते हैं बल्कि अपनी भाषा में लोगों को समझाते भी हैं। एक इंटरव्यू में वे कहते हैं, ‘1962 में पर्यावरण पर स्टाकहोम कॉन्फ्रेंस हुई थी उसके बाद लोगों ने विकास के लिए पर्यावरण के महत्व को समझा लेकिन आज पचास से ज्यादा साल गुजर गए फिर भी हम पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर संघर्ष कर रहे हैं।

जादव की बात वैसे तो पूरे देश के लिए सही है लेकिन खासतौर पर असम के लिए तो उसका महत्व बहुत ज्यादा है। हाल ही में राज्य के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने जल संसाधन मंत्री उमा भारती से अनुरोध किया था कि केंद्र सरकार ब्रह्मपुत्र विकास प्राधिकरण का गठन करे। ब्रह्मपुत्र में अमूमन हर साल आने वाली बाढ़ से असम में लाखों लोग विस्थापित होते हैं। भूमि कटाव के कारण नदी किनारे की सैकड़ों हेक्टेयर जमीन भी बर्बाद होती है। पिछले दिनों आए कई अध्ययनों में कहा गया है कि ब्रह्मपुत्र का सबसे बड़ा नदी द्वीप माजुली 15-20 सालों में भूमि कटाव के चलते नदी में समा जाएगा। यदि माजुली पर घना जंगल हो तो इसे बचाना मुमकिन है। जादव का गांव अरुणा सपोरी माजुली के पास ही है और वे खुद माजुली के बारे में चिंतित हैं। वे कहते हैं, ‘मैं अभी रुकने वाला नहीं हूं और यही एक तरीका है जिससे माजुली को बचाया जा सकता है।

कम से कम प्रतीकात्मक रूप से ही सही लेकिन सरकार भी जादव के काम को पहचान रही है। असम सरकार ने उनके लगाए जंगल का नाम मोलाई कठोनी रखा है। जादव को उनके माता-पिता प्यार से मोलाई ही बुलाते थे और असमिया भाषा में कठोनी का मतलब है लकड़ी। इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी गुवाहाटी के प्रोफेसर अरुप शर्मा जादव के पक्के समर्थक हैं। ब्रह्मपुत्र द्वारा होने वाले भूमि कटाव के विशेषज्ञ शर्मा को जादव की पहल में पूरे असम के लिए उम्मीद नजर आती है। वे फॉरेस्ट मैन फिल्म में मोलाई कठोनी पर चर्चा करते हुए कहते हैं कि यदि पूरे ब्रह्मपुत्र बेसिन में इस तरह की पहल चलाकर जंगल खड़ा कर दिया जाए न सिर्फ भूमि कटाव की समस्या खत्म हो जाएगी बल्कि असम भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन जाएगा।

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जादव पायेंग ने 1200 एकड़ का जंगल खड़ा करके न सिर्फ हजारों जंगली जानवरों को एक बसेरादिया है बल्कि पर्यावरण संरक्षण की एक अनोखी मिसाल भी कायम की है। तबाही अक्सर लोगों की हिम्मत तोड़ देती है। लेकिन जिंदगी का काम है आगे बढ़ना सो मजबूरी में लोगों को अपने ढर्रे पर लौटना होता है। लेकिन कुछ दुर्लभ लोग होते हैं जो तबाही से जूझने के बाद इस तरह आगे बढ़ते हैं कि उनका ही नहीं, न जाने कितनों का जीवन सकारात्मक रूप से बदल जाता है।
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The Policy Times