कानपुर के चमड़ा उद्योग मरने की कगार पर

प्रयागराज में 14 दिसंबर को शुरू हुआ कुम्भ मेला अब ख़त्म होने की कगार पर है लेकिन कई सकरात्मक पहलुओं वाले इस मेले ने चमड़ा व्यापारियों के लिए मुसीबतें बढ़ा दी है| कानपुर के चमड़ा उद्योग को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) और गंगा की सफाई से जुड़ी विभिन्न संस्थाओं के तरह-तरह के प्रतिबंधों तथा नियम-कानूनों को झेलना पड़ रहा है|

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Leather industry of Kanpur is on the verge of dying

प्रयागराज में 14 दिसंबर को शुरू हुआ कुम्भ मेला अब ख़त्म होने की कगार पर है लेकिन कई सकरात्मक पहलुओं वाले इस मेले ने चमड़ा व्यापारियों के लिए मुसीबतें बढ़ा दी है| कानपुर के चमड़ा उद्योग को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) और गंगा की सफाई से जुड़ी विभिन्न संस्थाओं के तरह-तरह के प्रतिबंधों तथा नियम-कानूनों को झेलना पड़ रहा है| इस कारण कानपुर की चमड़ा इकाइयों यानी टेनरियों के कारोबार में बार-बार बाधाएं आ रही हैं| इसी वजह से कई वर्षों के दबाव के कारण कानपुर के जाजमऊ की सभी छोटी-बड़ी चमड़ा इकाइयों को प्रदूषण नियंत्रण प्लांट लगाने पड़े है| इसके अलावा उन्हें कई अन्य उपाय करके सरकारी महकमों को संतुष्ट करना पड़ा है|

बता दें कि कानपुर प्रशासन कुम्भ मेले के शुरू होने से पहले शहर की 91 चमड़े की टेनरियों को ‘तत्काल बंद’ करने का आदेश दिया था जो गंगा नदी में अपने कचरे बहा रही हैं जिससे बड़े पैमाने पर जल प्रदूषित होता है| उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) के अधिकारी ने  बताया था कि इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि गंगा प्रदूषण मुक्त रहे और सबसे बड़े धार्मिक महोत्सव में जाने वाले भक्तों को शुद्ध और साफ पानी मिलता रहे|

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वैसे तो कानपुर के चमड़ा उद्योग को गंगा में प्रदूषित करने वाले सबसे बड़े कारणों में एक माना जाता है| इसी वजह से कानपुर के चमड़ा उद्योग को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) और गंगा की सफाई से जुड़ी विभिन्न संस्थाओं के तरह-तरह के प्रतिबंधों तथा नियम-कानूनों को झेलना पड़ता रहा है| इस कारण कानपुर की चमड़ा इकाइयों यानी टेनरियों के कारोबार में बार-बार बाधाएं भी आती रही हैं| इसी वजह से कई वर्षों के दबाव के कारण कानपुर के जाजमऊ की सभी छोटी-बड़ी चमड़ा इकाइयों को प्रदूषण नियंत्रण प्लांट लगाने पड़े| इसके अलावा भी उन्हें कई अन्य उपाय करके सरकारी महकमों को संतुष्ट करना पड़ा|

इस तरह के प्रतिबंधों से जूझते हुए कानपुर का चमड़ा कारोबार किसी तरह अपना अस्तित्व बचा रहा था| लेकिन पिछले साल 16 नवम्बर को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के कानपुर दौरे ने उस पर आफत ही बरपा दी| मुख्यमंत्री ने कानपुर में गंगा में गिर रही गंदगी पर नाराजगी जाहिर की और अधिकारियों और अभियंताओं को डांट पिलाई| अधिकारियों ने खुद को घिरता देखकर इसके लिए कानपुर जाजमऊ के चमड़ा उद्योग को जिम्मेदार ठहरा दिया| इसके बाद कानपुर के क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण कार्यालय ने टेनरियों को बंद करने का आदेश जारी कर दिया|

इस एकतरफा कार्रवाई से टेनरी मालिकों में हड़कंप मच गया| यह एक लिहाज से उनके साथ नाइंसाफी ही थी| इसलिए कि कानपुर में जाजमऊ चमड़ा उद्योग के उत्सर्जन को साफ करने की जिम्मेदारी निभाने वाले जल निगम का कहना था कि अभी ट्रीटमेंट प्लांट की मरम्मत का काम चल रहा है, इसलिए गंदगी गंगा में गिर रही है| उसका यह भी कहना था कि मरम्मत का काम 30 नवंबर तक पूरा हो जाएगा और फिर गंगा में टैनरियों का प्रदूषित उत्सर्जन गिरना खुद ही बंद हो जायेगा|

लेकिन इस बात को अनसुना करके सारा अपराध टेनरियों पर मढ़ दिया गया| 16 नवंबर से अचानक बंदी का आदेश हो गया| हालांकि काफी विवाद के बाद नौ दिसंबर को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुख्य पर्यावरण अधिकारी टीयू खान ने 1200 पेज के एक अन्य आदेश में जाजमऊ की 250 टेनरियों को चालू करने की अनुमति दे दी| लेकिन इसके साथ एक शर्त थी| शर्त यह थी कि अगले आदेश तक उन्हें 50 फीसदी से कम क्षमता पर चलाया जाएगा|

वैसे हैरानी की बात यह भी है कि कुंभ के दौरान गंगा में प्रदूषण न बढ़े, इसके लिए मुख्यमंत्री ने जाजमऊ की सभी टेनरियों को 15 दिसंबर 2018 से 15 मार्च 2019 तक यानी तीन महीनों के लिए बंद करने के आदेश दिए थे| मगर अधिकारियों ने अधिक चापलूसी दिखाते हुए 16 नवंबर से ही टेनरियों को बंद करवा दिया था| मुख्यमंत्री के आदेश का असर जाजमऊ की 268 टेनरियों पर पड़ा है| उन्हें अपना सारा काम एक झटके में बंद करना पड़ गया|

जाजमऊ इलाके में छोटी-बड़ी लगभग 400 टेनरियां हैं| इनमें से सवा सौ से अधिक अलग-अलग कारणों से पहले ही बंद हैं| लेकिन बाकी 268 पर कुंभ के कारण अस्थाई रूप से बंदी की मार पड़ रही है| कानपुर के टैनरी उद्यमी मानते हैं कि सरकार के इस कदम ने उद्योग की कमर तोड़ दी है| उनके मुताबिक बंद पड़ी इकाइयों को बिजली, सफाई मशीनों के रखरखाव आदि के लिए लगभग 10 लाख रुपये प्रति माह का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ रहा है|

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चमड़ा कारोबारी हफीजुर्ररहमान उर्फ बाबू भाई कहते हैं, ‘चमड़ा साफ करने वाली सभी टेनरियों में चमड़े को कई तरह की रसायनिक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है| इसके लिए लकड़ी के बड़े-बड़े ड्रम इस्तेमाल होते हैं| यह सतत प्रक्रिया होती है| बंदी के आदेश के वक्त जो माल अलग-अलग चरणों में शोधित हो रहा था वह सब तो बेकार हो ही गया, अब ड्रम भी नए सिंरे से तैयार करने पड़ेंगे| बाबू भाई आगे कहते हैं, ‘यह सब हमारे लिए लाखों की चपत है| इस अवधि में कारोबार का जो नुकसान हुआ है वह तो बहुत होगा| इन तीन-साढ़े तीन महीनों में जाजमऊ की टेनरियों का कुल नुकसान ढाई हजार करोड़ प्रति महीने से ज्यादा का हुआ है|

कानपुर के प्रदूषण विशेषज्ञ भी मानते हैं कि इस मामले में सिर्फ टेनरियों को अपराधी ठहराना उचित नहीं है| जाजमऊ की सारी टेनरियों में सरकारी निर्देशों के अनुसार प्राइमरी ट्रीटमेंट प्लांट लगे हैं| इन प्लांटों से निकले उत्सर्जन को कनवर्स के जरिए कामन इन्फ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट यानी सीईटीपी तक पहुंचाया जाता है| सीईटीपी का प्रबंध जल निगम करता है| इसलिए अगर सीईपीटी से कोई गंदगी गंगा में जा रही है या सिंचाई के लिए छोड़े जा रहे पानी में जा रही है तो उसके लिए टेनरियों को कैसे जिम्मेदार माना जा सकता है? कनवर्स से उत्सर्जन को सीईटीपी तक पहुंचाने के लिए चार पंपों का इस्तेमाल होता है| लेकिन ये चारों खराब पड़े थे| मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान यह बात सामने आई तो उन्होंने नए पंपों के लिए 17 करोड़ रु की रकम भी जारी कर दी| लेकिन इनको भी लगाने में काफी समय लग गया|

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प्रयागराज में 14 दिसंबर को शुरू हुआ कुम्भ मेला अब ख़त्म होने की कगार पर है लेकिन कई सकरात्मक पहलुओं वाले इस मेले ने चमड़ा व्यापारियों के लिए मुसीबतें बढ़ा दी है| कानपुर के चमड़ा उद्योग को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) और गंगा की सफाई से जुड़ी विभिन्न संस्थाओं के तरह-तरह के प्रतिबंधों तथा नियम-कानूनों को झेलना पड़ रहा है|