सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने ‘दलित शब्द के इस्तेमाल से बचने का आग्रह किया

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एक परामर्श जारी कर सभी मीडिया संस्थानों को बॉम्बे हाईकोर्ट के एक फैसले के आधार पर अनुसूचित जातियों से जुड़े लोगों के लिए ‘दलित शब्द के इस्तेमाल से बचने का आग्रह किया है| चैनलों से आग्रह किया गया है कि वे अनुसूचित जाति के लोगों का उल्लेख करते हुए ‘दलित’ शब्द के इस्तेमाल से बच सकते हैं|

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सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एक परामर्श जारी कर सभी मीडिया संस्थानों को बॉम्बे हाईकोर्ट के एक फैसले के आधार पर अनुसूचित जातियों से जुड़े लोगों के लिएदलित  शब्द के इस्तेमाल से बचने का आग्रह किया है| चैनलों से आग्रह किया गया है कि वे अनुसूचित जाति के लोगों का उल्लेख करते हुएदलितशब्द के इस्तेमाल से बच सकते हैं|

कार्यकर्ता वीआरए की तरफ से वकील श्रीराम पराककट ने याचिका दायर की है। रमेश नाथन ने कहा किदलितशब्द एक स्वयं का चुना गया नाम था एक सकारात्मक आत्मपहचानकर्ता और राजनीतिक पहचान, जाति व्यवस्था से प्रभावित लोगों और कई शताब्दियों तक अस्पृश्यता के अभ्यास का वर्णन करने के लिए। याचिका में कहा गया है किदलितशब्द का अर्थ हैविभाजित, विभाजित, टूटा हुआ, बिखरा हुआ“|

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सात अगस्त को सभी निजी टीवी चैनलों को संबोधित करके लिखे गए पत्र में बॉम्बे हाईकोर्ट के जून के एक दिशानिर्देश का उल्लेख किया गया है| उस दिशानिर्देश में मंत्रालय को मीडिया द्वारादलितशब्द का इस्तेमाल नहीं करने को लेकर एक निर्देश जारी करने पर विचार करने को कहा गया था|

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के परामर्श पत्र में कहा गया, ‘मीडिया अनुसूचित जाति से जुड़े लोगों का जिक्र करते वक्त दलित शब्द के उपयोग से परहेज कर सकता है| ऐसा करना माननीय बॉम्बे हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन करना होगा| इसके तहत मीडिया को अंग्रेजी में शिड्यूल कास्ट (अनुसूचित जाति) और दूसरी राष्ट्रीय भाषाओं में इसके उपयुक्त अनुवाद का इस्तेमाल करना चाहिए|

1930 के दशक में, “दलितशब्द को लोकप्रिय किया गया था और डॉ बीआर अम्बेडकर द्वारा दिया गया था अम्बेडकर ने ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़ित लोगों के अखिल भारतीय समुदाय को संदर्भित किया।

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम, 1989 – जिसमें एससी / एसटी समुदायों के एक सदस्य के संदर्भ को उनके जाति के नाम से संदर्भित करने के प्रावधान थे। अधिनियम अत्याचार आयोग के खिलाफ एक पूर्ण कोड था। याचिका में कहा गया है कि अब एक और परिपत्र की जरूरत नहीं है।

इकोनॉमिक टाइम्स की खबर के अनुसार, प्राइवेट टेलीविजन न्यूज चैनलों का प्रतिनिधित्व करने वाली न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) के कुछ सदस्यों ने पिछले कुछ दिनों में इन नियमों का विरोध किया है|

एनबीए के एक सदस्य ने अपना नाम जाहिर करने की शर्त पर कहा, ‘दलित शब्द का इस्तेमाल लंबे समय से मीडिया रिपोर्टों में किया जा रहा है| राजनेता, शिक्षक और दलित नेता खुद इसका इस्तेमाल करते हैं|

एक संपादक ने कहा कि यह बहुत मुश्किल है क्योंकि टीवी न्यूज़ चैनल पर कई बार पुरानी वीडियो दिखाई जाती है, जिसमें दलित शब्द का इस्तेमाल किया गया है| अब उन वीडियो में से दलित शब्दों को हटाना बेहद मुश्किल है| बहुत सारे नेता और शिक्षक शब्द का इस्तेमाल करते हैं, जिससे उन्हें चेतना और बल मिलता है|

उन्होंने आगे कहा, ‘यह एक सामाजिक तौर पर स्वीकार किया गया शब्द है, यह अपमानजनक नहीं है. इस वजह से हमें यह समझ नहीं रहा कि हमें इसका इस्तेमाल क्यों रोकना चाहिए? इसका इस्तेमाल लंबे समय से हो रहा है और हम कैसे पैनलिस्ट्स या मेहमानों को इसका इस्तेमाल करने से रोक सकते हैं|

इससे पहले केंद्र सरकार ने 15 मार्च को केंद्र और राज्यों के सभी विभागों से आधिकारिक संचार मेंदलितशब्द के इस्तेमाल से बचने और इसके स्थान पर अनुसूचित जाति (अनुसूचित जाति) का इस्तेमाल करने को कहा था.

 

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