मुजफ्फरपुर शेल्टर होम काण्ड : क्यों खामोश है मीडिया?

बिहार के मुजफरपुर के एक शेल्टर हाउस में न जाने कितने वर्षो से लड़कियों का यौन शोषण किया जाता रहा और इसकी सुगबुगाहट तक किसी को महसूस नहीं हो पाई| मुंबई के एक संस्थान टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ (टिस) की ‘कोशिश’ टीम ने अपनी समाज लेखा रिपोर्ट में दावा किया कि बालिका गृह की कई लड़कियों ने यौन उत्पीड़न की शिकायत की है|

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Muzaffarpur Shelter Home Rape Case: A Look
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अब तक बाबाओं, नेता व मंत्रियो के यौन शोषण के किस्से सुनते आए लेकिन कभी यह उम्मीद नहीं थी कि जिसे लोकतंत्र और जनता की आवाज़ माना जाता है वह भी कभी बलात्कार जैसे विकृत घटनाओं में संलिप्त हो सकता है| बिहार, जिसे पत्रकारिता के क्षेत्र में तेज़-तर्रार और मुद्दों को निडरता से उठाने वाला राज्य माना जाता है, उससे इतनी बड़ी घटना कैसे छुट गई या इरादतन उठाया नही गया, यह स्वयं में एक बड़ा सवाल है| हैरत करने वाली बात है कि जिस संस्था पर बालिकाओं के यौन शोषण का आरोप लगा है वह एक बड़ा मीडिया हाउस भी संचालित करता है और हिंदी अखबार प्रातः कमल, उर्दू अखबार हालातबिहार और अंग्रेजी दैनिक न्यूज नेक्स्ट भी चलाता है, वह इस गुनाहों में शामिल है… शर्मनाक है|

बिहार के मुजफरपुर के एक शेल्टर हाउस में न जाने कितने वर्षो से लड़कियों का यौन शोषण किया जाता रहा और इसकी सुगबुगाहट तक किसी को महसूस नहीं हो पाई| मुंबई के एक संस्थान टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ (टिस) की ‘कोशिश’ टीम ने अपनी समाज लेखा रिपोर्ट में दावा किया कि बालिका गृह की कई लड़कियों ने यौन उत्पीड़न की शिकायत की है| साथ ही उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है और आपत्तिजनक हालातों में रखा जाता है, जिसके बाद यह खबर प्रकाश में आई|

बालिका गृह में रह रहीं 42 लड़कियों में से 34 के साथ बलात्कार होने की पुष्टि हो गई है और शिकार हुई लड़कियों में से कुछ 7 से 13 साल के बीच की हैं| यह स्वयं में बड़ा सवाल खड़ा करता है कि इतने सालों से इन लड़कियों के साथ बलात्कार होते रहे और इतनी बड़ी वारदात को अंजाम देते रहे परन्तु किसी को भी इसकी भनक तक नहीं लगी|

इसे समय का अंतर कह सकते है क्यूंकि यह कोई नई घटना नहीं है, लेकिन आज के दौर में इस तरह की घटनाओं की रिपोर्टिंग की जाने लगी है और खबरे सामने आने लगी है जिस वजह से जो लोग छुपकर गुनाह को अंजाम देते है वे अब ज्यादा समय तक बच नहीं पाते| पिछले वर्ष 2017 में राम रहीम का जो भांडा फूटा वह भी किसी रहस्य से कम नहीं था|

राम रहीम को समाज सेवक से लेकर फ़िल्मी हीरो के रूप में जाना जाता था लेकिन इस चेहरे के पीछे जिस तरह बच्चियों और औरतों के यौन शोषण की ख़बरें  सुर्ख़ियों में आई तब डेरा सच्चा सौदा आश्रम, जो 63 वर्षो से संचालित था उसकी हकीकत सामने आ गई| ये लोग इसी तरह आश्रम और सामाजिक संस्था खोलकर अपने नापाक इरादतों को अंजाम देते है ताकि किसी को इनके गुनाह पर शक न हो|

आज हमारे देश की मीडिया एक पक्षीय हो चुकी है| आज ज्यादातर मीडिया हाउस निजी कंपनियों के हाथो में है और ऐसी ही ख़बरें दिखाई और छापी जाती है जिसे सरकार दिखाना चाहती है| आज ख़बरों का स्वरुप भी बदल चूका है क्यूंकि मीडिया अपने मूल कर्तव्यों को भूलता जा रहा है लेकिन कुछ ऐसी गैर-लाभकारी संस्थाएं भी है जो इस तरह की ख़बरों को प्रमुखता से दिखाता है|

आज देश में किसान आन्दोलन और मजदूर आन्दोलन चरम पर है जिसे मीडिया उतनी प्रमुखता से नहीं दिखाता| आज के दौर में ज्यादतर सेक्टर में निजी कंपनियों का कब्ज़ा हो गया है| आज चार साल के अन्दर अम्बानी और अडानी की कंपनियां जिस प्रकार तेज़ी से परवान चढ़ रही है इनकी ऐसी स्थति पहले नहीं थी| इन सबको देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि आज सरकार और बाज़ार दोनों दोस्त बन चुके है, वे जैसी चाहे वैसी ख़बरें जनता के बीच परोस्तें है और उसे ही वैधानिक रूप देते है|

मुजफ्फरपुर के बालिकागृह आश्रम में संस्था का मालिक, कर्मचारी और बाल कल्याण का सदस्य इस घिनोने काम में शामिल है और इसके साथ ही राज्य कल्याण मंत्री का पति भी मामले में आरोपी बताया जा रहा है| दिलचस्प बात तो यह है कि 2013 में इस एनजीओ को लेकर समाज कल्याण विभाग को नकारात्मक रिपोर्ट भेजी गई थी इसके बावजूद एनजीओ को हर साल सरकारी विज्ञापन और फंड मिलता रहा और इससे सरकार भी शक के घेरे में आ गई है| इस मामले को सीबीआई को सौंप दिया गया है लेकिन यह अपना काम कितनी सच्चाई और निष्पक्षता से कर पाएगी यह कहना मुश्किल है क्यूंकि जब सरकार ही कटघरे में हो तो वहां न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है| अब तक संस्था पर लगे आरोप खबर के स्तर तक सिमित है, देखते है बच्चियों के साथ हुए इस घिनोने कुकर्म की सजा दोषियों को कब तक मिल पाती है|

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बिहार के मुजफरपुर के एक शेल्टर हाउस में न जाने कितने वर्षो से लड़कियों का यौन शोषण किया जाता रहा और इसकी सुगबुगाहट तक किसी को महसूस नहीं हो पाई| मुंबई के एक संस्थान टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ (टिस) की ‘कोशिश’ टीम ने अपनी समाज लेखा रिपोर्ट में दावा किया कि बालिका गृह की कई लड़कियों ने यौन उत्पीड़न की शिकायत की है|