मेडिकल कौंसिल ऑफ़ इंडिया: 3 साल के कार्यात्मक अस्पतालों वाले मेडिकल कॉलेजों को ही मिलेगी अनुमति

निति आयोग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2011-2018 में जिन 89 नए मेडिकल कॉलेजों को मंजूरी दी गई थी उसमे 39 कॉलेज ‘मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया’ द्वारा निरीक्षण के दौरान विफल रहे है| रिपोर्ट के अनुसार इनमे से ज्यादातर मामले अस्पताल की लचर कार्यप्रणाली के रूप में पाई गई है|

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Only Medical Colleges with Functional Hospitals for 3 Years May Get MCI Approval

निति आयोग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2011-2018 में जिन 89 नए मेडिकल कॉलेजों को मंजूरी दी गई थी उसमे 39 कॉलेज ‘मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया’ द्वारा निरीक्षण के दौरान विफल रहे है| रिपोर्ट के अनुसार इनमे से ज्यादातर मामले अस्पताल की लचर कार्यप्रणाली के रूप में पाई गई है|

मेडिकल कौंसिल द्वारा गठित बोर्ड ‘एमसीआई बोर्ड ऑफ गवर्नेंस’ अब नए मेडिकल कॉलेजों को उन संस्थानों तक सीमित करने के विकल्प पर विचार कर रही है जिनके अस्पताल कम से कम तीन वर्ष से काम कर रहे है| एमसीआई के नियमों के मुताबिक, 100 सीटों वाले मेडिकल कॉलेज में कम से कम 300 बेड के साथ एक कार्यात्मक शिक्षण अस्पताल होना चाहिए जबकि निरीक्षण में कुछ मेडिकल कॉलेजों में संकाय में बेड की कमी पाई गई|

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सीटों को ले कर बढ़ रहे है घोटाले

अब तक के इन सालों में मेडिकल कॉलेजों में सीटों को लेकर घोटालें बढे है| प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की 250 सीटों के घोटालों पर एक रिपोर्ट सामने आई है जिसमें छात्रों को 200 और उससे कम अंक होने के बावजूद 80 लाख से एक करोड़ रुपए लेकर दाखिला दे दिया गया| इसके तहत एक या दो नहीं बल्कि 250 के करीब सीटें बेच दी गईं है| ऐसे में यह सवाल उठता है कि जो छात्र नीट में बेहतर अंक नहीं ला पाए वे प्राइवेट मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री हासिल करने के बाद मरीजों की जान से खिलवाड़ नहीं तो और क्या करेंगे? राज्य के डीएमई की नाक के नीचे ऐसी गड़बड़ शर्मनाक है।

निजी मेडिकल कॉलेजों की मंहगी फीस

मेडिकल कॉलेजों में दूसरी बड़ी समस्या के रूप में महँगी फीस छात्रों के सामने चुनौती बनी हुई है| डॉक्टरों की कमी के नाम पर सरकार इन कॉलेजों को हर साल फीस या सीटें बढ़ाने की इजाजत तो देती है लेकिन उनकी फीस पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है| देश में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीटों की तादाद मांग से बहुत कम है|

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‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ के मुताबिक, प्रति एक हजार की आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए परंतु भारत में यह अनुपात इसके विपरीत है| बावजूद इसके मेडिकल शिक्षा पर खर्च बढ़ने की वजह से मांग व आपूर्ति का असंतुलन बढ़ता जा रहा है|
विदेशी कॉलेजों का सहाराइन सभी समस्याओं के मद्देनज़र यह परिणाम निकल कर सामने आ रहे है कि अब ज्यादातर छात्र विदेशी संस्थानों व कॉलेजों की ओर रुख कर रहे है| भारत में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला नहीं मिलने की स्थिति में हर साल हजारों छात्र पढ़ाई के लिए चीन, बांग्लादेश, रूस और मलेशिया जसे देशों का रुख करते हैं| लेकिन उनके सामने भी मुश्किलें कम नहीं हैं| पढ़ाई पूरी करने के बाद उनको प्रैक्टिस शुरू करने से पहले मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) की एक पात्रता परीक्षा को पास करना पड़ता है| इस परीक्षा के कठिन स्तर को लेकर भी अक्सर सवाल उठते रहे हैं|
देश में निजी व सरकारी क्षेत्र में एमबीबीएस की लगभग 70,000 हजार सीटें हैं| लेकिन जो माता-पिता निजी कॉलेजों की भारी-भरकम फीस का बोझ नहीं उठा पाते वे अपने बच्चों को विदेशों में भेजने को तरजीह देते हैं| भारत के निजी कॉलेजों के मुकाबले विदेशों में खर्च लगभग आधा या उससे भी कम है|

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निति आयोग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2011-2018 में जिन 89 नए मेडिकल कॉलेजों को मंजूरी दी गई थी उसमे 39 कॉलेज ‘मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया’ द्वारा निरीक्षण के दौरान विफल रहे है| रिपोर्ट के अनुसार इनमे से ज्यादातर मामले अस्पताल की लचर कार्यप्रणाली के रूप में पाई गई है|
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The Policy Times

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