बाल मजदूरी रोकने में मिल रही अभूतपूर्व सफलता

भारत एक ऐसा देश है जहां दुनिया के सबसे ज्यादा बाल मजदूर रहते हैं। यूनीसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में दुनिया के करीब 12 फीसदी बाल मजदूर रहते हैं। यह एक चिंताजनक आंकड़ा है। लोग मानते हैं कि देश-दुनिया में जो बाल मजदूरी है, उसकी वजह गरीबी है। 1 मई को पूरी दुनिया में श्रमिक दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन दुनियाभर में मजदूरों की स्थिति पर चिंतन किया जाता है।

0
237 Views

 

  • एक दशक में दो तिहाई कम हुए बाल मजदूर
  • बाल मजदूरी में यूपी, महाराष्ट्र और बिहार सबसे ऊपर
  • बाल मजदूरी पर संवैधानिक प्रावधान
  • बाल श्रम से मुक्त रखने को शुरू हुआ ऑपरेशन मुस्कान

भारत एक ऐसा देश है जहां दुनिया के सबसे ज्यादा बाल मजदूर रहते हैं। यूनीसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में दुनिया के करीब 12 फीसदी बाल मजदूर रहते हैं। यह एक चिंताजनक आंकड़ा है। लोग मानते हैं कि देश-दुनिया में जो बाल मजदूरी है, उसकी वजह गरीबी है। 1 मई को पूरी दुनिया में श्रमिक दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन दुनियाभर में मजदूरों की स्थिति पर चिंतन किया जाता है। सबसे ज्यादा चिंतन अगर किसी पर करने की जरूरत है तो वह बाल मजदूरी पर है। भारत के संदर्भ में अच्छी बात यह है कि यहां सरकारी नीतियां सही दिशा में आगे बढ़ रही हैं और देश बाल मजदूरी के उन्मूलन की तरफ तेजी से आगे बढ़ रहा है।

हमारे देश के करीब 44 करोड़ बच्चों में से 14 करोड़ बाल श्रमिक हैं। हर साल अकेले कुपोषण से ही 10 लाख से ज्यादा बच्चों की मौत हो जा रही है। लगभग 10 करोड़ बच्चों को स्कूल नसीब नहीं हैं। छह साल तक के 2.3 करोड़ बच्चे कुपोषण और कम वजन के शिकार हैं। दुनिया में 26 करोड़ बच्चे स्कूल से बाहर हैं और लगभग 17 करोड़ बच्चे बाल श्रमिकों के रूप में काम कर रहे हैं, जिनमें से आधे तो खनन, कचरा बीनने और कपड़ा फैक्ट्रियों में काम करने जैसे खतरनाक कामों में लगे हैं।

साल 2001 और 2011 की जनगणना के अनुसार श्रम एवं रोजगार मंत्रालय भारत सरकार की एक रिपोर्ट जागरण को मिली। रिपोर्ट 2001 के अनुसार, देश में 5-14 उम्र के कुल 25.2 करोड़ बच्चे थे जिनमें से 1.26 करोड़ बाल मजदूरी को मजबूर थे। साल 2004-05 में नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन (एनएसएसओ) के एक सर्वे के अनुसार देश में लगभग 90.75 लाख बाल मजदूर थे। इस सर्वे में भी अच्छी बात यह निकलकर आयी की 2001 की जनगणना के आधार पर बाल मजदूरों में 43.53 लाख की कमी आयी थी। इस सर्वे में दिखा की बाल मजदूरी खत्म करने के लिए सरकार की कोशिशें रंग दिखा रही हैं।

बाल मजदूरी में यूपी, महाराष्ट्र और बिहार सबसे ऊपर

साल 2011 की जनगणना के अनुसार बाल मजदूरी के लिहाज से उत्तर प्रदेश बच्चों के लिए सबसे खतरनाक जगह है। यहां 8.96 लाख बाल मजदूरी कर रहे थे, जबकि दूसरे नंबर पर स्थित महाराष्ट्र में 4.96 लाख बच्चे बाल मजदूरी में लिप्त थे। बिहार इस लिस्ट में तीसरे नंबर पर है और यहां 4.51 लाख बच्चे बाल मजदूरी कर रहे थे। साल 2011 की जनगणना में लक्ष्यद्वीप में सबसे कम बाल मजदूर पाए गए। यहां सिर्फ 28 बच्चे बाल मजदूरी में लिप्त थे। दमन और दीव में 774 और अंडमान निकोबार में 999 बच्चे बाल मजदूरी कर रहे थे।

बाल मजदूरी पर संवैधानिक प्रावधान

धारा 21ए- शिक्षा का अधिकार कानून के तरह राज्य सरकार की तरफ से 6-14 साल के हर बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा मुहैया कराई जाएगी।

धारा 24- कारखानों में बच्चों के काम पर निषेध – इस कानून के तहत भी 14 साल से कम उम्र के बच्चों को फैक्ट्रियों या किसी भी खतरनाक रोजगार में लगाने पर प्रतिबंध है।

साल 2016 में संसद में बाल मजूदरी के खिलाफ एक नए कानून को पास किया गया जिसमें 14 साल से कम उम्र के बच्चों के मजदूरी करने को गैरकानूनी करार दिया गया। सुनने में तो स्वतंत्रता दिवस पर भारत में 5 से 17 साल के करीब 50 लाख 70 हज़ार बाल मजदूरों के लिए इससे अच्छा तोहफा कुछ नहीं हो सकता लेकिन इस नए कानून में एक छूट भी दी गई है।

इस कानून के एक अनुच्छेद के मुताबिक अभिभावक और रिश्तेदार अपने बच्चों को स्कूल खत्म होने के बाद काम पर लगा सकते हैं, क्योंकि सरकार मानती है कि भारत की आर्थिक सच्चाईयों से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। साल 2016 में श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने एनडीटीवी से बातचीत में कहा कि यह कानून बच्चों से मजदूरी करवाने की नहीं, परिवारों को सिर्फ अपने बच्चों की मदद लेने की अनुमति देता है। हालांकि कागज़ों से बाहर निकलकर ज़मीनी स्तर पर हक़ीकत कुछ और ही है।

सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश

10 दिसंबर 1996 को सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश दिए कि खतरनाक उद्योगों में लगे बच्चों को वहां से निकाला जाए और उन्हें किसी शिक्षण संस्थान में दाखिला दिलाया जाए। बच्चों को काम पर लगाने वाले संस्थान को हर बच्चे के लिए 20 हजार रुपये बच्चों की भलाई के लिए बनाए गए वेलफेयर फंड को देने होंगे। बाल मजदूरी से बचाए गए बच्चे के परिवार के एक सदस्य को रोजगार दिलाया जाए या ऐसे प्रत्येक बच्चे के लिए राज्य सरकार 5000 रुपये वेलफेयर फंड में जमा कराए। जो बच्चे खतरनाक कार्यों में नहीं लगे हैं, उनके काम पर नजर रखी जाए और सुनिश्चित किया जाए कि बच्चा 6 घंटे से ज्यादा काम न करे। इसके साथ ही कम से कम दो घंटे वह पढ़ाई भी करे। उस बच्चे की पढ़ाई पर आने वाला पूरा खर्चा उसके मालिक द्वारा वहन किया जाएगा।

बाल श्रम से मुक्त रखने को शुरू हुआ अभियान, ऑपरेशन मुस्कान

साल 2017 में बाल कल्याण समिति ने एक जुलाई से 31 जुलाई तक ऑपरेशन मुस्कान चलाया हुआ था। इस अभियान के तहत भीख मांगते, कूड़ा बीनते व मजदूरी करते छोटे बच्चों को पकड़ा जाता है। एक महीने में 86 ऐसे बच्चे मिले हैं, जिनसे परिजन काम करवा रहे थे या उनसे भीख मंगवा रहे थे। टीम ने बच्चों को पकड़कर अपने पास रखा और बच्चों को माता पिता से दोबारा काम न करवाने का शपथपत्र लेकर उन्हें छोड़ा। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य बाल मजदूरी रोकना है।

यह अच्छा होता कि वर्तमान सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए गैर-जोखिम क्षेत्रों में भी बाल श्रम को प्रतिबंधित ना करके स्कूल के बाद वाले समय और छुट्टियों में स्वीकार्य रहने दिया जाता। ज़ाहिर सी बात है कि बाल श्रम अगर वैध हो तो बाल-श्रमिकों के पास रोज़गार के अधिक सुअवसर होंगे जबकि अवैध होने पर केवल माफिया ठेकेदार किस्म के लोग उन्हें नौकरी पर रख शोषण और दमन करेंगे। बाल मजदूरी के जड़ से उन्मूलन के लिए प्रतिबन्ध की बजाय तीन सबसे प्रभावी उपाय है, (1) अच्छे स्कूल – वाउचर और निजी स्कूलों को बढ़ावा, (2) लाइसेंस परमिट राज का खात्मा और उच्च विकास दर, और (3) श्रम कानूनों में सुधार। बाल-श्रम के बुनियादी आर्थिक कारणों को संबोधित किए बिना आप कितने ही छापा मार अभियान चलाये या प्रतिबन्ध लगाएं, यह समस्या जड़ से खत्म नहीं होगी।

Summary
Article Name
Unprecedented success in preventing child labor
Description
भारत एक ऐसा देश है जहां दुनिया के सबसे ज्यादा बाल मजदूर रहते हैं। यूनीसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में दुनिया के करीब 12 फीसदी बाल मजदूर रहते हैं। यह एक चिंताजनक आंकड़ा है। लोग मानते हैं कि देश-दुनिया में जो बाल मजदूरी है, उसकी वजह गरीबी है। 1 मई को पूरी दुनिया में श्रमिक दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन दुनियाभर में मजदूरों की स्थिति पर चिंतन किया जाता है।
Author
Publisher Name
The Policy Times