मध्य प्रदेश में शिक्षा की बदहाली के लिए ज़िम्मेदार कौन?

शिक्षा एक ऐसा मुद्दा जिससे ज़्यादातर नौजवानों की ज़िंदगी प्रभावित होती है, वह किसी सरकार के मूल्यांकन का आधार क्यों नहीं बन पा रहा है| क्यू मध्य प्रदेश में शिक्षा जैसा अहम् मुद्दा राजनेताओं की बड़ी बड़ी सभाओं और भाषणों में चर्चा का बिषय नहीं नहीं बन पा रहा है?

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Who is responsible for the loss of education in Madhya Pradesh?
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शिक्षा एक ऐसा मुद्दा जिससे ज़्यादातर नौजवानों की ज़िंदगी प्रभावित होती है, वह किसी सरकार के मूल्यांकन का आधार क्यों नहीं बन पा रहा है| क्यू मध्य प्रदेश में शिक्षा जैसा अहम् मुद्दा राजनेताओं की बड़ी बड़ी सभाओं और भाषणों में चर्चा का बिषय नहीं नहीं बन पा रहा है?

प्राथमिक शिक्षा के बारे में आये दिन समाचार पत्रों में कोई न कोई खबर मिलती रहती है। कहीं मध्यान भोजन खाकर बच्चे बीमार पड़ते या मर जाते हैं तो कहीं पर उन बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी निभाने वाले मास्टर साहब अनुपस्थित मिलते हैं। समस्या तब और भयावह लगती है जब जाँच के दौरान यह पता लगता है क़ि पांचवीं में पढने वाले बच्चे को 100 तक गिनती भी नहीं आती। अब प्रश्न यह है क़ि उपरोक्त स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है? सरकार, शिक्षक, या समाज?

अगर हम उच्च शिक्षा की बात करें तो उसमे भी राहत नहीं है| आज इंजीनियरिंग की पढ़ाई चरमरा गई है| प्रोफेशनल कोर्स के रूप में इंजीनियरिंग की पढ़ाई ख़त्म होती जा रही है| ऐसे में छात्र किस कोर्स की तरफ जाये| इंजीनियरिंग कॉलेज मानो ख़त्म से होते जा रहे हैं, या अगर मौजूद हैं तो खस्ताहाल में है|

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2017 में एक ख़बर बहुत चर्चा में रही थी कि भारत में 800 इंजीनियरिंग कॉलेज बंद हो गए हैं वहीं इसी साल 8 अप्रैल को टाइम्स ऑफ इंडिया में मानस प्रतिम ने लिखा था कि AICTE से 200 इंजीनियरिंग कॉलेजों ने बंद होने की अनुमति मांगी है| यही नहीं हर साल 50 फीसदी से अधिक सीटें खाली रह जा रही हैं| गुजरात से ही हाल में खबर आई थी कि इंजीनियरिंग की आधी सीटें यानी 1 लाख से अधिक सीटें ख़ाली रह गई हैं|

देश में चल रही शिक्षा की बदहाली के चलते गौर करने की बात ये है की मध्य प्रदेश में राजनैतिक पार्टियों के मैनिफेस्टोस में जहां किसानों, महिलाओं को जगह मिली है वही शिक्षा जैसा अहम् मुद्दा शामिल नहीं है| जबकि मध्य प्रदेश में 15 साल से बीजेपी काबिज है लेकिन अभी तक नयी शिक्षा नीति सामने नहीं बन पायी है|

वहीं मध्य प्रदेश की शिक्षा ब्यवस्था जर्जर अवस्था में है| एसोसिएशन फॉर साइंटिफिक एंड अकादमिक रिसर्च (ASAR) 2017 की रिपोर्ट हमे ये बताती है कि 18 साल की उम्र के 27.8% जिनमे 32.1% लड़कियां स्कूल में दर्ज नहीं हैं| अकेले मध्यप्रदेश में वर्ष 2010-11 से 2015-16 के बीच 42 लाख बच्चों ने माध्यमिक स्तर के पहले ही शिक्षा छोड़ दी |

पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मध्य प्रदेश के रीवा कॉलेज में अपने भाषण में कहा था क़ि सरकारों को शिक्षा की चिंता करनी चाहिए | रीवा कॉलेज जिसमे में लगभग 600 छात्र पढ़ते हैं और 8 गेस्ट टीचर हैं| इस कॉलेज में स्थायी प्रिंसिपल भी कार्यरत नहीं है जिसकी जगह प्रभारी प्रिंसिपल है|

मध्य प्रदेश के शिक्षा बिभाग 2015-16 की रिपोर्ट के मुताबिक़ प्रदेश में लगभग 28 लॉ कॉलेज हैं जिनमें किसी एक में भी प्रिंसिले मौजूद नहीं है| सरकारी कॉलेजों में 704 प्रोफेसर होने चाहिए लेकिन 474 पद आज भी खाली हैं|

लम्बे समय से मध्य प्रदेश में स्थायी शिक्षकों की भर्ती नहीं हुई है| पूरे मध्य प्रदेश में कुल 12000 गेस्ट टीचर हैं जिनमे 1000 ऐसे गेस्ट टीचर हैं जो सरकारी कॉलेजों में पढ़ा रहे हैं| कुल 7412 पदों में से 3025 पद रिक्त पाए गए|

ऐसे में राजनैतिक पार्टियों द्वारा शिक्षा जैसे अहम मुददे को दरकिनार कर देना कहाँ तक सही है?

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शिक्षा एक ऐसा मुद्दा जिससे ज़्यादातर नौजवानों की ज़िंदगी प्रभावित होती है, वह किसी सरकार के मूल्यांकन का आधार क्यों नहीं बन पा रहा है| क्यू मध्य प्रदेश में शिक्षा जैसा अहम् मुद्दा राजनेताओं की बड़ी बड़ी सभाओं और भाषणों में चर्चा का बिषय नहीं नहीं बन पा रहा है?
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