क्या सरकार की कठपुतली बन जाएगा आरटीआई कानून?

सीआईसी की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक 23 जुलाई 2019 तक केंद्रीय सूचना आयोग में 28,442 अपीलें और 3,209 शिकायतें लंबित थे| इस तरह सीआईसी में कुल 31,651 मामले लंबित पड़े हैं| कार्यकर्ताओं का कहना है कि मोदी सरकार को सूचना का अधिकार क़ानून में संशोधन करने के बजाय सूचना आयोगों में आयुक्तों की नियुक्ति करनी चाहिए ताकि आरटीआई क़ानून मज़बूत बने|

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सुचना का अधिकार भारतीय नागरिकों के लिए वह अधिकार है जिसमे आम व्यक्ति सरकार से जुडी किसी भी तरह की जानकारी हासिल कर सकता है लेकिन हाल ही में आरटीआई में हुए संसोधन की वजह से यह सवालों के घेरे में बना हुआ है| देशभर में आरटीआई संशोधित बिल को लेकर विरोध चल रहा है, इसलिए इस तथ्य को जानना ज़रूरी है कि आखिर क्या वजह है जिसके कारण आरटीआई एक्टिविस्ट और सामाजिक कार्यकर्ता सड़कों पर उतर गए है|

संसदीय कार्य राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने पिछले हफ्ते यानी 19 जुलाई को आरटीआई संसोधित बिल लोकसभा में पेश किया था जिसके बाद से ही विपक्षी पार्टियों की ओर से विरोध किया जा रहा था, बावजूद इसके यह बिल सोमवार को लोकसभा में भारी बहुमत के साथ पास कर दिया गया|

क्या बदलाव हुए  

मोदी सरकार द्वारा पेश सुचना के अधिकार बिल में आरटीआई कानून, 2005 की धारा 13 और 16 में संसोधन किया जा रहा है जिसके बाद से यह बिल सवालों के घेरे में बना हुआ है| मोदी सरकार का प्रस्ताव है कि अब कार्यकाल का फ़ैसला केंद्र सरकार करेगी| संशोधित बिल की धारा 13 में मुख्य सूचना आयुक्त के वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तें मुख्य चुनाव आयुक्त के समान ही होंगे और सूचना आयुक्त के भी चुनाव आयुक्त के समान होंगे|

आरटीआई का मूल कानून, 2005 कानून की धारा 13 केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्तों का कार्यकाल पांच साल (65 साल की उम्र तक, इसमें से जो पहले हो) निर्धारित करती है| आरटीआई कानून की धारा 16 राज्य स्तर पर सीआईसी एवं आईसी की सेवा शर्तों, वेतन भत्ते एवं अन्य सुविधाओं का निर्धारण करती है|


जब आरटीआई के तहत पीएम मोदी की डिग्री पर उठा था सवाल 

यह सूचना आयोग के कुछ आदेशों की पृष्ठभूमि में आता है जिन्हें हाल के दिनों में मोदी सरकार के लिए असहज माना गया था जब पीएम मोदी की डिग्री और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में एनपीए को लेकर सवाल उठा था|

पहला, जनवरी 2017 में, एक आरटीआई कार्यकर्ता सुचना के अधिकार के जरिए दिल्ली विश्वविद्यालय से उस रजिस्टर के उन पन्नों की प्रति मांगी थी, जिसमें वर्ष 1978 में विश्वविद्यालय से पास होने वाले बीए के सभी छात्रों के बारे में पूरी सूचना हो| 1978 वही वर्ष है, जिस वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कथित तौर पर दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए की डिग्री हासिल की थी लेकिन, दिल्ली विश्वविद्यालय ने इस रजिस्टर की प्रति देने से इनकार कर दिया| सुचना आयुक्त एम श्रीधर आचार्युलु ने प्रधानमंत्री मोदी की स्नातक डिग्री के बारे में सुचना के अधिकार के तहत दिल्ली विश्वविद्यालय के 1978 के बीए डिग्री रिकॉर्ड को सार्वजनिक कर दिया था जिसके बाद मुख्या सुचना आयुक्त आर के माथुर ने श्रीधर आचार्युलु से एचआरडी (ह्यूमन रिसोर्स डेवलपमेंट) का पद छीन लिया था|

दूसरा, जब मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल के कार्यकाल में, भारतीय रिज़र्व बैंक को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में एनपीए का विवरण और बड़े ऋण डिफॉल्टरों का विवरण उपलब्ध कराने के लिए एक आरटीआई आवेदन दाखिल किया गया था जिसमें आरबीआई ने गोपनीय प्रकृति का हवाला देते हुए जानकारी देने से इनकार किया था|

सीआईसी में 32 हज़ार अपील और शिकायतें लंबित

सुचना के अधिकार में बदलाव की बजाय यदि सरकार इसे मजबूत और सशक्त बनाने में काम करेगी तो एक पारदर्शी लोकतंत्र की स्थापना हो सकेगी| सीआईसी की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक 23 जुलाई 2019 तक केंद्रीय सूचना आयोग में 28,442 अपीलें और 3,209 शिकायतें लंबित थे| इस तरह सीआईसी में कुल 31,651 मामले लंबित पड़े हैं|

पिछले करीब ढाई सालों में ये सर्वाधिक लंबित मामलों की संख्या है| इससे पहले एक अप्रैल 2017 को लंबित मामलों की संख्या 26,449 थी| आरटीआई को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं और पूर्व सूचना आयुक्तों का कहना है कि आयोगों में सूचना आयुक्त के पदों का खाली रहना इसकी सबसे बड़ी वजह है|

पिछले साल 26 अप्रैल 2018 को सुप्रीम कोर्ट में सूचना आयुक्तों की जल्द नियुक्ति के लिए एक याचिका दायर की गई थी| उस समय तक करीब 23,500 से ज्यादा मामले लंबित थे| यानी लंबित मामलों की संख्या में कमी आने के बजाय करीब एक साल के भीतर इसमें 8,000 और मामलों की बढ़ोतरी हुई है|

कार्यकर्ताओं का कहना है कि मोदी सरकार को सूचना का अधिकार क़ानून में संशोधन करने के बजाय सूचना आयोगों में आयुक्तों की नियुक्ति करने की ज़रूरत है ताकि आरटीआई क़ानून और मज़बूत बने|

 

आरटीआई की दिशा में काम करने वाला गैर सरकारी संगठन सूचना के जन अधिकार का राष्ट्रीय अभियान (एनसीपीआरआई) की सदस्य अंजलि भारद्वाज का कहना है कि सरकार को सूचना आयुक्तों की नियुक्ति कर के आरटीआई कानून को और मजबूत बनाना चाहिए लेकिन वे इसमें संशोधन करने इसे सरकार की कठपुतली बना रहे हैं|

बहरहाल, आरटीआई संशोधन विधेयक यदि राज्यसभा से भी पारित हो जाता है तो केंद्रीय सूचना आयुक्त (सीआईसी), सूचना आयुक्तों और राज्य के मुख्य सूचना आयुक्तों के वेतन और कार्यकाल में बदलाव करने की अनुमति केंद्र को मिल जाएगी| फिलहाल, आरटीआई कानून के मुताबिक एक सूचना आयुक्त का कार्यकाल पांच साल या 65 साल की उम्र, जो भी पहले पूरा हो, का होता है|

अभी तक मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त का वेतन मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त के वेतन के बराबर मिलता है| वहीं राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्त का वेतन चुनाव आयुक्त और राज्य सरकार के मुख्य सचिव के वेतन के बराबर मिलता है|

कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव संगठन के सदस्य और आरटीआई कार्यकर्ता वेंकटेश नायक कहते हैं कि सरकार पूरी तरह से लोकतांत्रिक प्रक्रिया का दमन कर रही है और जनता के संवैधानिक अधिकार आरटीआई को काफी कमजोर किया जा रहा है| उन्होंने कहा कि आरटीआई संशोधन विधेयक लाने से पहले जनता से कोई राय सलाह नहीं ली गई| सरकार की प्राथमिकता सूचना आयुक्तों की नियुक्ति करने की होनी चाहिए, न कि इसमें संशोधन कर इसे कमजोर बनाने की|



 

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सीआईसी की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक 23 जुलाई 2019 तक केंद्रीय सूचना आयोग में 28,442 अपीलें और 3,209 शिकायतें लंबित थे| इस तरह सीआईसी में कुल 31,651 मामले लंबित पड़े हैं| कार्यकर्ताओं का कहना है कि मोदी सरकार को सूचना का अधिकार क़ानून में संशोधन करने के बजाय सूचना आयोगों में आयुक्तों की नियुक्ति करनी चाहिए ताकि आरटीआई क़ानून मज़बूत बने|
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The Policy Times