कार्यस्थल में विकलांगों के लिए सकरात्मक बदलाओं लाने की ज़रूरत

भारत में विकलांगों की संख्या दो करोड़ से अधिक है| इनके लिए आज भी देश में विशेष स्कूलों का अभाव है जिसकी वजह से अधिकांश विकलांग ठीक से पढ़-लिखकर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं बन पाते लेकिन समय बदलने के साथ-साथ आज कॉर्पोरेट जगत ऐसे लोगों को परिक्षण और नौकरी देने की पहल कर रहा है| इस पहल को 29 वर्षीय शंकर चंद्रशेखर, जो दृष्टिहीन है, के उदहारण से देखा जा सकता है|

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पिछले तीन सालों से शंकर चंद्रशेखर एक आईटी फर्म में काम कर रहे हैं| वे कहते है नौकरी खुद एक संघर्ष से भरा है लेकिन एक विकलांग व्यक्ति के लिए यह चुनौतियों से भरा है| एक वरिष्ठ सॉफ्टवेयर परीक्षक के तौर पर काम कर रहे चंद्रशेखर कहते हैं कि उनकी तरह ही इस फर्म में कई दृष्टि बाधित व्यक्ति है लेकिन उनमे प्रतिभा की कोई कमी नहीं है| वे आगे कहते है शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों में प्रतिभा होने के बाद भी वे अपने करियर में आगे नहीं बढ़ पाते| उनकी विकलांगता उनके करियर में बाधा बनती है इसलिए ऐसे व्यक्तियों की प्रतिभा को निखारने और उनके सम्मान के लिए ऐसे कार्य करने की ज़रूरत है जिसमे उनकी प्रतिभा विकलांगता से ना ढके|

इसके साथसाथ चंद्रशेखर ने कार्यस्थल में विकलांग व्यक्तियों के लिए संवेदनशीलता की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला| वे कहते हैं कि अक्षमता के बारे में जागरूकता स्कूल से शुरू होनी चाहिए| साथ ही कंपनियों को ऐसे लोगों के लिए संवेदनशीलता कार्यशालाएं बनाने की ज़रूरत हैबंगलुरु के फर्म में कार्य कर रहे दृश्य विकार वाले व्यक्ति कहते हैं कि उनके वर्कप्लेस में वे सारी बुनियादी सुविधाएं है जिसकी उन्हें  आवश्यकता होती है| वे कहते है हमारे पास रैंप, ब्रेल लेबल के साथ मार्ग और आवाज़ के उपयोग के साथ लिफ्ट हैं लेकिन अभी भी कई बाधाएं हैं जिसमें परेशानियों का सामना करना पड़ता है|

अक्षमता पर काम कर रहे संगठनों का कहना है कि विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों के प्रावधान अधिनियम, 2016 को पत्र और भावना में लागू किया जाना चाहिए| कर्नाटक राज्य विकलांग और देखभाल करने वाले संघ के अध्यक्ष जीएन नागराज कहते हैं कि अधिनियम यह सुनिश्चित करता है कि विकलांग लोगों के अधिकारों को रोजगार सहित सभी मामलों में सुरक्षित रखा जाए लेकिन राज्य सरकार ने नियमों को तैयार करने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है जो अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक हैं| अधिनियम विकलांग लोगों के लिए नौकरियों को सुनिश्चित करने के लिए निजी और सरकारी नियोक्ताओं पर एक दायित्व रखता है| जब तक रोजगार के अवसर प्रदान नहीं किए जाते हैं, बेरोजगार लोगों को ₹ 5,000 के रखरखाव भत्ता दिया जाना चाहिएआज से एक दशक पहले विकलांग व्यक्ति के लिए कॉर्पोरेट जगत में काम करना दुर्गम बाधा थी| कार्यस्थल में ऐसे लोगों को कैसे देखा जाए इसमें सकारात्मक बदलाव लाने की ज़रूरत है| आज से पहले किसी कॉर्पोरेट जगत में शारीरिक रूप से असक्षम व्यक्तियों के लिए जगह नहीं थी लकिन आज समय बदल रहा है|

संगठनात्मक व्यवहार और मानव संसाधन प्रबंधन के प्रोफेसर मुक्ता कुलकर्णी ने हाल ही में यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगनडियरबर्न, ओरेगॉन स्टेट यूनिवर्सिटी, स्विट्जरलैंड में सेंट गैलेन विश्वविद्यालय और न्यू ऑरलियन्स के विश्वविद्यालय में चार प्रोफेसरों के साथ मिलकर एक पेपर तैयार किया जिसमे इस बात पर बल दिया गया कि कार्यस्थल में विकलांग लोगों के साथ कैसे व्यवहार किया जाए| इसे हाल ही में मानव संसाधन प्रबंधन पत्रिका में प्रकाशित भी किया गया थाइस मामले में यदि भारत के सन्दर्भ में देखा जाए तो बेंगलुरु बाकी अन्य शहरों से आगे है| बेंगलुरु में हाल ही में फर्म में नौकरियों की भर्ती को लेकर ख़ास सुधार हुए है लेकिन इस दिशा में अभी भी एक लम्बा सफ़र तय करना बाकी हैकॉर्पोरेट जगत के अलावा सरकारी क्षेत्र में भी अब विकलांगों के लिए नौकरियों के दरवाज़े खुल रहे है| साल 2015 में देश की सरकार ने शारीरिक तौर पर अक्षम लोगों को सरकारी नौकरी में 10 साल तक की छूट दी जिसमें सीधी भर्ती वाली सेवाओं के मामले में दृष्टि बाधित, बधिर और चलनेफिरने में विकलांग या सेरेब्रल पल्सी के शिकार लोगों को उम्र में 10 साल की छूट दी है| हालाँकि, सरकार की ओर से विकलांग व्यक्तियों के लिए यह तौफा 56 उम्र के अधिक व्यक्तियों के लिए नहीं है|

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 Need to bring positive changes for disabled people in the workplace
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भारत में विकलांगों की संख्या दो करोड़ से अधिक है| इनके लिए आज भी देश में विशेष स्कूलों का अभाव है जिसकी वजह से अधिकांश विकलांग ठीक से पढ़-लिखकर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं बन पाते लेकिन समय बदलने के साथ-साथ आज कॉर्पोरेट जगत ऐसे लोगों को परिक्षण और नौकरी देने की पहल कर रहा है| इस पहल को 29 वर्षीय शंकर चंद्रशेखर, जो दृष्टिहीन है, के उदहारण से देखा जा सकता है|
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The Policy Times
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