2018 Independence Day: कहीं हम ‘मॉडर्न स्लेव’ तो नहीं बन रहे?

हर साल की तरह इस साल भी भारत जश्न-ए-आज़ादी में मग्न है लेकिन यह भी कटु सत्य है कि हमारा देश राजनितिक सियासत, भ्ररष्टाचार, गरीबी, बेरोज़गारी, आतंकवाद, उग्रवाद और अन्य अपराधजनित गुलामी से जकड़ा है|

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आज हम आज़ाद है… क्या वाकई? भारत को कई विदेशी ताकतों ने लूटा लेकिन देर-सवेर भारत आज़ाद हो ही गया|आज भारत आज़ाद है तो केवल उन औपनिवेशिक ताकतों से जिसने पहले कभी भारत पर कब्ज़ा किया था, उस धरती से आज़ाद है जिस पर कभी अंग्रेज़ अपनी हुकूमत किया करते थे लेकिन भारत की यह आज़ादी सिर्फ अंग्रेजों से मुक्ति मिलने की है क्यूंकि देश अभी भी उन बुराइयों और जटिलताओं से आज़ाद नहीं हो पाया है जिसका गुलाम भारत पहले था|

हर साल की तरह इस साल भी भारत जश्न-ए-आज़ादी में मग्न है लेकिन यह भी कटु सत्य है कि हमारा देश राजनितिक भ्ररष्टाचार, गरीबी, बेरोज़गारी, आतंकवाद, उग्रवाद और अन्य अपराधजनित गुलामी से जकड़ा है| आज देश अपनी स्वतंत्रता की 72वीं वर्षगाँठ मना रहा है ऐसे में यह कहना कि भारत अभी भी गुलाम है थोडा नकरात्मक ज़रूर लगता है लेकिन ऐसे वक्त पर ही इन मूल्यों की असल पहचान की जा सकती है|

आज़ादी के 72वें साल में देश की जो प्रगति होनी थी वह आज तक प्रगति की राह पर ही है जिसकी सबसे बड़ी वजह है भ्ररष्टाचार की गुलामी| याद होगा 21 दिसम्बर 1963 में भ्ररष्टाचार के खात्मे पर संसद में खूब बहस हुई थी और इसमें डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि सिंहासन और व्यापार के बीच संबंध भारत में जितना दूषित, भ्रष्ट और बेईमान हो गया है उतना दुनिया के इतिहास में कहीं नहीं हुआ है।

भारत की आज़ादी के असल मायने बदल से रहें है| देश की एक बड़ी आबादी जहाँ अपनी जीवन की स्वतंत्रता का लुत्फ़ उठा रही है वहीँ आधी आबादी गरीबी और महंगाई के मकड़जाल में है| यही असामनता देश के नागरिकों को दो भाग में बांटने की ज़िम्मेदार है और इसकी वजह है लगातार क्षीण होती राजनितिक इच्छाशक्ति| आज जिस विकास और आज़ादी के नाम पर देश भर में शोर गुल है आप ज़रा देश के किसी कोने में चले जाएं, कहीं न कहीं आप हक़ीकत से रूबरू हो जायेंगे|

हमारे देश का संविधान धर्मनिरपेक्ष, सहिष्णु, और उदार समाज की गारंटी देता है तो वहीँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का सबसे अहम हिस्सा माना गया है परन्तु यह बताने की ज़रूरत नहीं कि आज देश में किस प्रकार से अभिव्यक्ति की आज़ादी को कुचला जा रहा है| आज भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यह हाल हो चूका है कि इसे बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार भी भारत से अपील कर चूका है| गत 5 सितम्बर को पत्रकार और मानवाधिकार संरक्षक गौरी लंकेश की दर्दनाक हत्या कर दी गई|

दरअसल यह प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला था| यह अकेला ऐसा उदहारण नहीं है, इस तरह की घटना देश में लगातार बढ़ रही है जिस पर सरकार खामोश है| देश की सरकार को इसी चुप्पी से आज़ाद होने की ज़रूरत है और साथ ही जवाबदेह बनने की भी| आज हम अंग्रेज़ की गुलामी से तो मुक्त हो गए लेकिन अब हम ‘मॉडर्न स्लेव’ में तब्दील होते जा रहें है जिसमें कहने को तो हम आज़ाद है लेकिन इस आज़ादी के बीच भारत तमाम विकृतियों की गुलामी की जकड़न में फंसते जा रहा है|

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2018 Independence Day: कहीं हम ‘मॉडर्न स्लेव’ तो नहीं बन रहे?
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2018 Independence Day: कहीं हम ‘मॉडर्न स्लेव’ तो नहीं बन रहे?
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हर साल की तरह इस साल भी भारत जश्न-ए-आज़ादी में मग्न है लेकिन यह भी कटु सत्य है कि हमारा देश राजनितिक सियासत, भ्ररष्टाचार, गरीबी, बेरोज़गारी, आतंकवाद, उग्रवाद और अन्य अपराधजनित गुलामी से जकड़ा है|
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The Policy Times
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