एक नए स्टडी के अनुसार दुनिया के आधे आमिर देश ‘बेबी संकट’से जूझ रहा हैं

विकासशील देशों में जहाँ शिशु जन्म दर बढ़ रहा है वहीँ, दूसरी ओर विकसित देशों में बेबी संकट जैसे हालात पैदा हो रहें है| वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी द्वारा स्थापित ‘द इंस्टिट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स ऐंड इवैल्युएशन’ ने शुक्रवार को एक रिपोर्ट पेश की जिसमे पाया गया कि विकासशील देशो की तुलना में विकसित देशों की महिलाएं पर्याप्त बच्चें पैदा नहीं कर पा रहीं है|

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विकासशील देशों में जहाँ शिशु जन्म दर बढ़ रहा है वहीँ, दूसरी ओर विकसित देशों में बेबी संकट जैसे हालात पैदा हो रहें है| वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी द्वारा स्थापित द इंस्टिट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स ऐंड इवैल्युएशनने शुक्रवार को एक रिपोर्ट पेश की जिसमे पाया गया कि विकासशील देशो की तुलना में विकसित देशों की महिलाएं पर्याप्त बच्चें पैदा नहीं कर पा रहीं है|

द इंस्टिट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स ऐंड इवैल्युएशन’ (IHME) ने ग्लोबल पब्लिक हेल्थ का विस्तृत अध्ययन करने के लिए 8000 से ज्यादा डेटा स्रोतों का इस्तेमाल किया| आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला कि 1950 से 2017 के बीच दुनिया की आबादी बहुत ही तेजी से बढ़ी| 1950 में जहां दुनिया की आबादी 2.6 अरब थी वह 2017 में बढ़कर 7.6 अरब हो गई। जनसंख्या में यह वृद्धि क्षेत्रवार और आय के अनुसार बहुत अलग है।

दुनिया के आधे देश बेबी संकटसे जूझ रहे

रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के करीब आधे देश बेबी संकटसे जूझ रहे हैं| यह जन्म दर जनसंख्या के स्तर को बरकरार रखने के लिए नाकाफी है। आंकड़ों के अनुसार, 195 देशों में से 91 देशों- मुख्यतः यूरोप और उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका के देशों में उतने बच्चे पैदा नहीं हो रहे हैं जो मौजूदा आबादी को बरकरार रखने में सक्षम हो| इन देशों में जन्म दर औसत वैश्विक जन्म दर से नीचे है| दूसरी तरफ अफ्रीका और एशिया में फर्टिलिटी रेट का बढ़ना जारी है| उदाहरण के तौर पर, नाइजीरिया में औसतन एक महिला अपने जीवनकाल में 7 बच्चे पैदा करती है|

अफगानिस्तान की हालत बेहतर

इस मामलें में अफगानिस्तान की हालत अन्य देशों की तुलना में कुछ बेहतर है| रिपोर्ट के मुताबिक साइप्रस धरती पर सबसे कम उर्बर देश है जहां औसतन एक महिला अपने जीवनकाल में सिर्फ एक बच्चे को जन्म देती है| इसके उलट, माली, चाड और अफगानिस्तान जैसे कुछ देशों में औसतन एक महिला 6 से ज्यादा बच्चों को जन्म देती है|

आईएचएमई (IHME) के डायरेक्टर क्रिस्टोफर मरे ने बताया कि इन आंकड़ों से पता चलता है कि जहां कुछ देशों में बेबी बूम जैसे हालात हैं वहीं, कुछ अन्य देशों में बेबी संकट जैसे हालात हैं|

बेबी संकट का मुख्य कारक शिक्षा

आमिर देशों में बढ़ते बेबी संकट के सन्दर्भ में आईएचएमई (IHME) में हेल्थ मेट्रिक्स साइंसेज के प्रफेसर अली मोकदाद ने बताया कि जनसंख्या वृद्धि दर को निर्धारित करने वाला अगर कोई इकलौता सबसे अहम कारक है तो वह है शिक्षा| उन्होंने बताया कि एक महिला जितनी अधिक शिक्षित होगी वह उतना ही ज्यादा स्कूल-कॉलेज में समय बिताएंगी| इस तरह वह देर से गर्भवती होगी और उसके बच्चे भी कम होंगे|

अध्ययन में यह बात भी सामने आई है कि जिन देशों में लोग आर्थिक तौर पर बेहतर हैं वहां बच्चों के जन्म होने की दर में गिरावट देखी जा रही है। प्रफेसर अली मोकदाद बताते हैं कि एशिया और अफ्रीका में जनसंख्या अभी भी बढ़ रही हैं और लोग गरीबी से बाहर निकलकर बेहतर आय वर्ग में शामिल हो रहे हैं| जिन देशों में बेहतर आर्थिक विकास की उम्मीद है वहां जन्म दर में भी गिरावट देखने को मिलेगी|

द लैंसेटमेडिकल जर्नल में प्रकाशित यह अध्ययन दिखाता है कि पुरुषों की जीवन प्रत्याशा में बढ़ोतरी हुई है| 1950 में जहां यह 48 वर्ष थी वहीं, 2017 में यह बढ़कर 71 वर्ष हो गई| दूसरी तरफ 1950 में महिलाओं की जीवन प्रत्याशा 53 वर्ष थी, जो अब बढ़कर 76 वर्ष हो गई है|

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विकासशील देशों में जहाँ शिशु जन्म दर बढ़ रहा है वहीँ, दूसरी ओर विकसित देशों में बेबी संकट जैसे हालात पैदा हो रहें है| वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी द्वारा स्थापित ‘द इंस्टिट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स ऐंड इवैल्युएशन’ ने शुक्रवार को एक रिपोर्ट पेश की जिसमे पाया गया कि विकासशील देशो की तुलना में विकसित देशों की महिलाएं पर्याप्त बच्चें पैदा नहीं कर पा रहीं है|
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The Policy Times
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