साल 2018 अल्पसंख्यक, सत्ता के आलोचकों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, और पत्रकारों के लिए रहा संघर्षपूर्ण

ह्यूमन राइट्स वाच (HRW) 2019 के रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2018 सत्ता के आलोचकों, सामाजिक- मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों और पत्रकारों के लिए संघर्षपूर्ण रहा|

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ह्यूमन राइट्स वाच (HRW) 2019 के रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2018 सत्ता के आलोचकों, सामाजिक- मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों और पत्रकारों के लिए संघर्षपूर्ण रहा| सरकार ने विरोध को दबाने के लिए राजद्रोह, मानहानि और आतंकवाद विरोधी कानूनों का इस्तेमाल जारी रखा|  साल 2018 में, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अगुआई वाली सरकार ने सत्ता की आलोचना करनेवाले एक्टिविस्टों, वकीलों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को अलगअलग तरीकों से परेशान किया और कई बार उनके खिलाफ़ सख्त कानूनी कार्रवाई भी कीअभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने के लिए राजद्रोह और आतंकवादबिरोधी कानूनों का इस्तेमाल भी किया गया| इसके अलावा सरकार के कार्यों या नीतियों की आलोचना करने वाले गैर सरकारी संगठनों को निशाना बनाया गयासरकार धार्मिक अल्पसंख्यकों, हाशिए के समुदायों और सरकार के आलोचकों पर बढ़ते भीड़ के हमलों की रोकथाम या उनकी विश्वसनीय जांच करने में भी नाकाम रही| गौरतलब है कि ये हमले अक्सर सरकार का समर्थन करने का दावा करने वाले समूहों द्वारा किए गए हैं. साथ ही कुछ वरिष्ठ भाजपा नेताओं ने सार्वजनिक रूप से ऐसे अपराधों के दोषियों का समर्थन किया| अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ भड़काऊ भाषण दिए गए और हिंदू प्रभुत्व और उग्र राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया, जिससे हिंसा को और बढ़ावा मिलासत्ताधारी भाजपा और इससे जुड़े कट्टरपंथी हिंदू समूहों ने पूरे साल अल्पसंख्यक समुदायों, विशेष रूप से मुस्लिमों को भीड़ की हिंसा का शिकार बनाया| उनके खिलाफ ये हमले गोमांस के लिए गायों के व्यापार या गौकशी की अफवाहों के आधार पर किए गए| इस साल नवंबर तक, 18 ऐसे हमले हो चुके थे और इसमें आठ लोग मारे गए|  फैक्टचेकर डॉट इन की हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुतबिक, साल 2018 में 26 दिसंबर तक धार्मिक हिंसा के 93 मामले सामने आए हैं| जो पिछले एक दशक में हुए धार्मिक हिंसा में सबसे ज्यादा है| इनमें हिंसा के सबसे ज्यादा 27 मामले अकेल यूपी से हैं| जब से भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में सत्ता में आई है, तब से लेकर अब तक देशभर में गोहत्या से जुड़ी हिंसा के 69% मामले अकेले उत्तर प्रदेश में दर्ज हुए हैंइसकी शुरुआत पश्चिमी यूपी के हापुड़ में 45 वर्षीय कासिम कुरैशी की लिंचिंग से हुई। 18 जून को, 45 वर्षीय कासिम को मौत के घाट उतार दिया गया था, और उसके साथी, 65 वर्षीय किसान समीउद्दीन को हापुड़ जिले के बाजरेपुर खुर्द गाँव में गोहत्या की अफवाहों पर बेरहमी से पीटा गया था।

पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में उनकी तस्वीर खींची गई, जो बाद में वायरल हो गई, जिससे राज्य के पुलिस प्रमुख को माफी मांगने के लिए मजबूर होना पड़ा। वीडियो में कासिम को अपने कपड़े फाड़े हुए जमीन पर लेटा हुआ दिखाया गया है। एक मिनट के वीडियो मेंलगभग एक ही समय में दायर किया गया, उसे दर्द और पानी के लिए भीख मांगते हुए सुना जा सकता है, जिसे भीड़ ने मना कर दिया। दुबई में 22 वर्षीय दर्जी शाहरुख खान, जो बरेली जिले के भोलापुर हिंडोलिया गांव में घर आए थे, 28 अगस्त को पशु चोरी के संदेह में पीटपीटकर हत्या कर दी गई थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गंभीर पिटाई के कारण किडनी और लिवर फेल होने की बात सामने आई है। 3 दिसंबर को, बुलंदशहर जिले के सियाना इलाके में, पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जिससे पूरे देश में बड़े पैमाने पर राजनीतिक बवाल मच गया था। भीड़ की हिंसा की इसी घटना के दौरान चिंगरावथी गांव के एक नागरिक सुमित की भी मौत हो गई थी। इस घटना के बाद, पहली बार, 80 से अधिक सिविल सेवकों ने आदित्यनाथ के सीएम पद से इस्तीफे की मांग की। भीड़ की हिंसा के ताजा उदाहरण में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की रैली के कुछ घंटों बाद, 29 दिसंबर को पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में एक पुलिस कांस्टेबल की हत्या कर दी गई। यूपी में भीड़ के हमले में मरने वाले पुलिस अधिकारी की यह दूसरी घटना थी। जुलाई में, असम सरकार ने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का मसौदा प्रकाशित किया| इसका मकसद थाबांग्लादेश से होने वाले गैर कानूनी प्रवासन के मुद्दे पर बारबार के विरोध प्रदर्शनों और हिंसा को देखते हुए भारतीय नागरिकों और वैध निवासियों की पहचान करना| चालीस लाख से अधिक लोगों, जिनमें से ज्यादातर मुस्लिम हैं, को रजिस्टर से निकाल बाहर कर दिए जाने की आशंका उन्हें मनमाने तरीके से हिरासत में रखने और राज्यविहीन करार देने की चिंताओं को दर्शाती हैपूर्व मेंअछूतकहे जाने वाले दलितों के साथ शिक्षा और नौकरियों में भेदभाव जारी है| दलितों के खिलाफ हिंसा में वृद्धि हुई है| कुछ हद तक ऐसा सामाजिक प्रगति और ऐतिहासिक जातीय भेदभाव को कम करने के लिए दलितों की अधिक संगठित एवं मुखर मांगों की प्रतिक्रिया में हुआ है|

नवंबर में, किसानों ने कर्ज और ग्रामीण समुदायों के लिए राजकीय समर्थन की कमी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया| उन्होंने महिला किसानों के अधिकार को मान्यता देने और जबरन अधिग्रहण के खिलाफ दलितों और जनजातीय समुदायों के भूमि अधिकारों की रक्षा की मांग कीअप्रैल में, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में संशोधन के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ कई उत्तर भारतीय राज्यों में दलित समूहों के विरोधप्रदर्शन के दौरान पुलिस के साथ झड़प में नौ लोगों की मौत हुई| कानून के कथित दुरुपयोग की शिकायत के मामले में, अदालत ने आदेश दिया था कि इस कानून के तहत मामला दर्ज करने से पहले वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को प्रारंभिक जांच करनी चाहिए| व्यापक विरोध के बाद, संसद ने अगस्त में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटते हुए कानून में संशोधन कियाजुलाई में, अहमदाबाद शहर में पुलिस ने उस इलाके में छापेमारी की जहां कमजोर और पिछड़ी छारा अनुसूचित जनजाति के बीस हजार लोग रहते हैं| वहां रहने वाले लोगों के मुताबिक, पुलिस ने कथित रूप से सैकड़ों लोगों की निर्ममतापूर्वक पिटाई की, कई लोगों के खिलाफ झूठे मामले दायर किए और संपत्ति को नुक़सन पहुंचायाआजादी के बाद वह अधिसूचना निरस्त कर दी गई थी जिसके द्वारा ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान कुछ जनजातियों को आपराधी जनजाति के रूप में चिन्हित किया गया था| अनुसूचित जनजातियों पर सरकार द्वारा नियुक्त समिति द्वारा जनवरी की एक रिपोर्ट में कहा गया कि वेसामाजिक कलंक, अत्याचार और बहिष्करणका सामना करने वाले सबसे निचले पायदान के समुदाय हैं| खनन, बांध और अन्य बड़ी आधारभूत संरचना परियोजनाओं के कारण जनजातीय समुदायों पर विस्थापन का खतरा बना हुआ हैसितंबर में, सुप्रीम कोर्ट ने बायोमैट्रिक पहचान परियोजना, आधार की संवैधानिकता को बरकरार रखा| कोर्ट ने कहा कि सरकार इसे सरकारी लाभों तक पहुंच और आयकर दाखिल करने के लिए एक आवश्यक शर्त बना सकती है, लेकिन उसने इसे अन्य उद्देश्यों के लिए प्रतिबंधित कर दिया| अधिकार समूहों ने इन चिंताओं को सामने रखा था कि आधार पंजीकरण अनिवार्यता ने गरीब और हाशिए के लोगों को खाद्य सेवाओं और स्वास्थ्य देखभाल सहित संवैधानिक रूप से गारंटीप्राप्त आवश्यक सेवाएं प्राप्त करने पर रोक लगा दी थी|

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The Policy Times
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