क्या अमेरिका और ईरान के बीच जंग होने वाली है?

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव फिर बढ़ गया है। बीते साल अमेरिका ने 2015 में हुए ईरान परमाणु समझौते से खुद को अलग कर लिया था। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उस पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए। मकसद था उस पर दबाव बनाना। लेकिन, ईरान के न झुकने के बाद बीते अप्रैल में अमेरिका ने उसके खिलाफ एक के बाद एक कई और बड़े फैसले लिए। इनके बाद से इन दोनों देशों के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है।

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America is preparing to attack Iran?

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव फिर बढ़ गया है। बीते साल अमेरिका ने 2015 में हुए ईरान परमाणु समझौते से खुद को अलग कर लिया था। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उस पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए। मकसद था उस पर दबाव बनाना। लेकिन, ईरान के न झुकने के बाद बीते अप्रैल में अमेरिका ने उसके खिलाफ एक के बाद एक कई और बड़े फैसले लिए। इनके बाद से इन दोनों देशों के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है।

अमेरिका और ईरान के टकराव के बीच विश्लेषक सैन्य संघर्ष की आशंका जता रहे हैं। ईरान की रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स के प्रमुख जनरल हुसैन सलामी ने कहा है कि ईरान के खिलाफ यूएस का जंग छेड़ना असंभव है। आईआरजीसी कमांडर ने दावा किया कि वॉशिंगटन के पास जरूरी सैन्य ताकत नहीं है। उन्होंने यूएस के ईरान के समुद्री क्षेत्र में एयरक्राफ्ट की तैनाती को केवल ‘मनोवैज्ञानिक दबाव’ बनाने की कोशिश करार दिया।

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ईरान के एक अन्य वरिष्ठ कमांडर ने दावा किया कि उनके देश के पास यूएस पर हमला करने के लिए फायरपावर मौजूद है। पिछले सप्ताह ही यूएस का अब्राहम लिंकन कैरियर 40 लड़ाकू एयरक्राफ्ट लेकर खाड़ी पहुंचा था। आईआरजीसी एयरोपस्पेस डिवीजन के प्रमुख अमीराली हजीदेह ने कहा, 40 -50 एयरक्राफ्ट कैरियर वाले प्लेन और 6000 जवानों को ले जाने में सक्षम एयरक्राफ्ट कैरियर अतीत में हमारे लिए बहुत बड़ा खतरा था लेकिन अब खतरे ‘मौके’ बन चुके हैं। अब अगर अमेरिकी कदम आगे बढ़ाते हैं तो हम उनके सिर पर वार करेंगे।

अगर हालिया घटनाक्रम को देखें तो यूएस और ईरान सैन्य संघर्ष के करीब नजर आ रहे हैं। यूएस ने मध्य-पूर्व एशिया में कथित ईरान के खतरे को लेकर युद्धपोतों की तैनाती की तो दूसरी तरफ फारस की खाड़ी में सऊदी अरब के दो तेल टैंक हमले का शिकार हो गए। यूएस और ईरान के बीच का तनाव लोगों को यूएस पर 2003 के हमले की याद दिला दे रहा है। हालांकि, ईरान पर 2003 की तरह हमला करना यूएस के लिए आसान नहीं होगा। विश्लेषकों का कहना है कि इस बार संघर्ष कई तरीकों से अलग है और यह पहले से खतरनाक हो सकता है। 2003 के इराक की तुलना में ईरान ज्यादा सशक्त देश है। ईरान यूएस से किस तरह से जंग लड़ेगा, ये भी बिल्कुल अलग है।

ईरान इराक की तुलना में बहुत बड़ा देश है। यूएस के हमले के वक्त इराक की आबादी 2.5 करोड़ थी जबकि ईरान की आबादी 8.2 करोड़ है। ईरान का भूभाग 591,000 वर्गमील है जबकि इराक के पास 168,000 वर्गमील जमीन थी। एक अनुमान के मुताबिक, हमला होने से पहले इराक की सेना में 450,000 जवान थे जबकि हालिया सर्वे के मुताबिक ईरान के पास 523,000 सक्रिय सैनिक और 250,000 रिजर्व सैनिक हैं।

ईरान की भौगोलिक स्थिति भी खास है। इराक से अलग ईरान समुद्री महाशक्ति है। ईरान के उत्तर में कैस्पियन सागर और दक्षिण में फारस की खाड़ी, ओमान की खाड़ी है। इसकी सीमाएं अफगानिस्तान, पाकिस्तान, तुर्की और इराक के साथ लगी है। ईरान यूरेशिया के केंद्र में स्थित है और व्यापार के लिए बहुत ही अहम है। ईरान और ओमान से घिरे होर्मूज स्ट्रेट से दुनिया के एक-तिहाई तेल टैंकर होकर गुजरते हैं। इस रास्ते का सबसे संकरा बिंदु केवल दो मील चौड़ा है। अगर ईरान इसे ब्लॉक कर दे तो वैश्विक तेल निर्यात में करीब 30 फीसदी की गिरावट देखने को मिल सकती है।

पारंपरिक सैन्य क्षमता के मामले में ईरान यूएस के आगे कहीं नहीं टिकता है लेकिन ईरान ने कई ऐसी रणनीतियां बनाई हैं जिससे वह क्षेत्र में यूएस के हितों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। ईरान के सुप्रीम नेता अयोतुल्लाह खेमानी की वफादार और नियमित सेना से अलग रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के अलावा ईरान के पास कुड्स फोर्स भी है जो इराक, लेबनान और सीरिया में प्रॉक्सी सेना खड़ी करने में मदद करती रही है।

ईरान ने पहले भी इस तरह के संगठनों का इस्तेमाल अमेरिकियों को निशाना बनाने में किया है। इस साल, पेंटागन के अनुमान के मुताबिक, ईरान की प्रॉक्सी फोर्स ने 2003 से 2011 के बीच इराक में करीब 608 अमेरिकी सैनिकों को मार गिराया। ईरान की प्रॉक्सी फोर्स इराक और अफगानिस्तान में फिर से उथल-पुथल मचा सकती है। ईरान की नेवी यूएस से ज्यादा फायदे की स्थिति में है। ईरान की नौसेना को होर्मूज खाड़ी को बंद करने के लिए बड़े जहाज या फायरपावर की जरूरत नहीं है बल्कि व्यापार को नुकसान पहुंचाने के लिए वह सबमरीन्स के इस्तेमाल से ही काम चला सकती है।

ऐसी आशंका है कि ईरान स्पीडबोट सुसाइड अटैक और मिसाइल के जरिए अमेरिकी सेना को बुरी तरह पस्त किया जा सकता है। 2017 की ‘ऑफिस ऑफ नेवल इंटेलिजेंस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, रिवॉल्यूशनरी गार्ड की नौसेना हथियारों से लैस छोटे और तेज रफ्तार वाले समुद्री जहाजों पर जोर देती है और उसे फारस की खाड़ी में उसे ज्यादा जिम्मेदारियां मिली हुई हैं। इसके बाद ईरान का बैलेस्टिक मिसाइल कार्यक्रम आता है जिसे मध्य-पूर्व में मिसाइलों के जखीरे की संज्ञा दी जाती है। ईरान की मिसाइल का खतरा उसके क्षेत्र से बाहर भी मौजूद है- हेजोबुल्लाह के पास 130,000 रॉकेटों का जखीरा है।

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यूएस अगर ईरान के साथ सैन्य संघर्ष में उलझता है तो उसे चीन और रूस जैसी महाशक्तियों की मदद की जरूरत पड़ेगी। न्यू यॉर्क टाइम्स के रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप के कार्यवाहक रक्षामंत्री पैट्रिक शानहन ने मध्य-पूर्व में 1 लाख 20 हजार सैनिकों की तैनाती की योजना बनाई है। उन्होंने कहा कि अगर ईरान अमेरिकी बलों पर हमला करता है या परमाणु कार्यक्रम शुरू करता है तो अमेरिका तैयार है हालांकि यह संख्याबल भी ईरान पर हमला करने के लिए नहीं बल्कि अपना बचाव करने के लिए है क्योंकि उसके लिए यूएस को और भी ज्यादा सेनाबल की जरूरत पड़ेगी।

ईराक में जब यूएस ने हमला किया था तो अमेरिकी सैनिकों की संख्या 150,000 थी जिसमें सहयोगी देशों के सैनिक भी शामिल थे। इराक पर हमले की आर्थिक कीमत 2 ट्रिलियन डॉलर आंकी गई थी जिसमें 2003 से 2011 के बीच करीब 400,000 लोग मारे गए थे। ईरान के खिलाफ सैन्य योजना बनाने वाले अमेरिकी अधिकारी इन पहलुओं को अच्छी तरह से समझते हैं। हालांकि यूएस सरकार यह कहने से बचती है कि ईरान के खिलाफ सैन्य संघर्ष बेहतर विकल्प नहीं है क्योंकि इससे तेहरान पर दबाव कम हो जाएगा। यूएस का ईरान के खिलाफ सैन्य संघर्ष बहुत ही खतरनाक रणनीति साबित हो सकती है और अमेरिका के सहयोगी देश भी इसे लेकर चिंतित हैं।

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अमेरिका और ईरान के बीच तनाव फिर बढ़ गया है। बीते साल अमेरिका ने 2015 में हुए ईरान परमाणु समझौते से खुद को अलग कर लिया था। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उस पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए। मकसद था उस पर दबाव बनाना। लेकिन, ईरान के न झुकने के बाद बीते अप्रैल में अमेरिका ने उसके खिलाफ एक के बाद एक कई और बड़े फैसले लिए। इनके बाद से इन दोनों देशों के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है।
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The Policy Times

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