नई शिक्षा नीति: पचास साल में तीसरी बार नई शिक्षा नीति लागू करने की तैयारी में केंद्र

लंबे इंतजार के बाद नई शिक्षा नीति का मसौदा सामने आ गया, लेकिन यह अच्छा नहीं हुआ कि ऐसा होते ही हिंदी को लेकर एक अनावश्यक विवाद छिड़ गया। अब जब यह विवाद शांत हो गया है तब फिर जरूरी यह है कि नई शिक्षा नीति को प्राथमिकता के आधार पर लागू करने की दिशा में कदम उठाए जाएं।

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Center for preparing for new education policy for third time in 50 years in education / laboratories
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लंबे इंतजार के बाद नई शिक्षा नीति का मसौदा सामने आ गया, लेकिन यह अच्छा नहीं हुआ कि ऐसा होते ही हिंदी को लेकर एक अनावश्यक विवाद छिड़ गया। अब जब यह विवाद शांत हो गया है तब फिर जरूरी यह है कि नई शिक्षा नीति को प्राथमिकता के आधार पर लागू करने की दिशा में कदम उठाए जाएं। हालांकि सरकार की ओर से ऐसे संकेत दिए गए है कि वह नई शिक्षा नीति की ज्यादातर सिफारिशों को अगले दो साल में लागू करने का इरादा रखती है, लेकिन उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसा वास्तव में हो। नई शिक्षा नीति को लागू करने में तेजी दिखाने की आवश्यकता इसलिए है, क्योंकि एक तो इस नीति का मसौदा देर से आ सका और दूसरे, शिक्षा का मौजूदा ढांचा व्यापक बदलाव की मांग करता है।

शायद ही कोई इससे असहमत हो कि प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक का हमारा ढांचा आज की जरूरतों के अनुरूप नहीं है। चूंकि समस्याएं प्राथमिक शिक्षा के स्तर से ही शुरू हो जाती हैैं इसलिए उनका दुष्प्रभाव माध्यमिक शिक्षा से लेकर उच्च स्तर तक नजर आता है। जहां प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर पाठ्यक्रम के साथ ही पठन-पाठन के तौर-तरीकों को दुरुस्त करने की सख्त जरूरत है वहीं माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर अंकों की होड़ को दूर करने की आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति तभी हो सकती है जब नई शिक्षा नीति की सिफारिशों पर न केवल विभिन्न राजनीतिक दलों और शिक्षाविदों, बल्कि केंद्र और राज्य सरकारों के बीच भी आम सहमति कायम हो सके। यह तभी संभव होगा जब नई शिक्षा नीति के मसौदे पर राजनीतिक संकीर्णता से मुक्त होकर विचार किया जाएगा।

किसी के लिए भी समझना कठिन है कि माध्यमिक शिक्षा के केंद्रीय और राज्यों के बोर्ड इस पर सहमत क्यों नहीं होे सकते कि परीक्षाओं में अंकों की होड़ खत्म हो? नि:संदेह परीक्षाओं में अंकों का कुछ न कुछ महत्व तो रहेगा ही, लेकिन इसका औचित्य नहीं कि छात्रों के व्यक्तित्व का मूल्यांकन केवल उन्हीं के आधार पर किया जाए। यह वक्त की मांग है कि विभिन्न शिक्षा बोर्ड एकमत होकर कार्य करें। परीक्षाओं में अंकों की होड़ समाप्त करने के साथ ही एक बड़ी जरूरत यह भी है कि प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर समान पाठ्यक्रम लागू किया जाए। अलग-अलग तरह के पाठ्यक्रम असमानता की खाई को चौड़ा करने का ही काम कर रहे है।

आखिर माध्यमिक शिक्षा का ढांचा ऐसा क्यों नहीं हो सकता जिससे इस स्तर की शिक्षा पूरी करने वाले छात्र करीब-करीब एक समान धरातल पर नजर आएं? माध्यमिक शिक्षा के मुकाबले उच्च शिक्षा कहीं अधिक गंभीर सवालों का सामना कर रही है। उच्च शिक्षा के अधिकांश संस्थान डिग्रियां बांटने के केंद्र बनकर रह गए हैैं। इन संस्थानों से निकलने वाले अधिकांश युवा उद्योग-व्यापार जगत की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रहे हैैं। बेहतर हो कि उच्च शिक्षा का स्तर इस तरह सुधारा जाए जिससे हमारे युवा किसी न किसी हुनर से लैस हों। उच्च शिक्षा को उपयोगी बनाने के लिए अब यह आवश्यक हो गया है कि उसे कौशल विकास से जोड़ा जाए।

2009 में स्कूल की परिभाषा बनी

2009 में यूपीए सरकार ने शिक्षा के अधिकार कानून में स्कूल की परिभाषा लिखी। इसमें इमारत की बाउंड्री, मेल-फीमेल शौचालय और प्रायमरी स्तर पर बच्चों और अध्यापक के अनुपात की बात शामिल थी। ये बातें जहां होंगी उसे स्कूल माना जाएगा। लेकिन अब मोदी सरकार की नई प्रस्तावित शिक्षा नीति में इसे खत्म कर सिर्फ लर्निंग पर ध्यान देने की बात कही गई है। यानी स्कूल को आरटीई के आधारभूत ढांचे पर फोकस करने की बजाए सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देने की बात कही गई है।

प्री प्राइमरी केजी सेकंड की बजाय सेकंड क्लास तक मानी जाएगी

प्री प्राइमरी पहली क्लास से पहले तक मानी जाती है लेकिन नई शिक्षा नीति के मसौदे में यह दूसरी क्लास तक मानी जाएगी। अभी प्राईमरी कक्षा 5 तक मानी जाती है लेकिन कर्नाटक में प्राइमरी कक्षा चार तक मानी जाती है।

सर्व शिक्षा अभियान (RTE)

अटल बिहारी बाजपेयी सरकार ने यूएन के कार्यक्रम एजुकेशन फॉर ऑल के तहत पूरे भारत में सर्व शिक्षा अभियान चलाया। जबकि यूपीए सरकार ने आरटीई कानून को जमीनी स्तर तक लागू करने के लिए सर्व शिक्षा अभियान के पूरे ढांचे को आरटीई में बदल दिया।

पहले हर डेढ़ किमी पर स्कूल

अटल सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान के तहत हर डेढ़ किमी में स्कूल खोलने का नियम बनाया था। इसके बाद यूपीए सरकार आरटीई कानून लेकर आई, जिसके तहत स्कूल की परिभाषा तय की गई। तय नियमों को पूरा करने के लिए कई राज्यों ने कई छोटे-छोटे स्कूलों को मर्ज कर दिया। क्योंकि ये आरटीई नियमों का पालन नहीं कर पा रहे थे। नई नीति में फिर स्कूलों के एकीकरण पर जोर है।

बंद हो चुके चार साल में ग्रेजुएशन की वापसी

लिबरल आर्ट्स साइंस एजुकेशन के चार वर्षीय कार्यक्रम को यूपीए-2 ने प्रयोग के तौर पर दिल्ली विवि में लागू किया था। लेकिन इसका विराेध हुआ कि जो छात्र 3 साल डिग्री के बाद नौकरी कर सकता है, उसे एक साल और क्यों रोका जाए। इसके बाद यूपीए सरकार ने ये प्लान ड्रॉप कर दिया। लेकिन अब यही प्लान मोदी सरकार नई शिक्षा नीति के मसौदे में ला रही है।

यूपी में भाजपा ने नौवीं को बोर्ड बनाया माया ने खत्म किया

1999 में उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार ने दसवीं के साथ ही नौंवी को बोर्ड परीक्षा बनाया था। जबकि 2002 में मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं तब ये नियम खत्म कर दिया। यूपी में ही मुलायम सिंह यादव अपने कार्यकाल में नकल अध्यादेश लेकर कभी नहीं आए। वहीं भाजपा सरकार ने हमेशा नकल अध्यादेश बोर्ड परीक्षा के दौरान लगाया।

नकल और परीक्षा पर ही छह बार बदले नियम

उप्र में 1991 में कल्याण सिंह सरकार एंटी कॉपिंग एक्ट-1992 लेकर आई। नकल गैर-जमानती अपराध बना। 1993 की सपा सरकार ने इसे खत्म कर दिया। 1997 में फिर भाजपा सत्ता में आई और नकल अधिनियम लागू हो गया। 2003 में मुलायम सीएम बने तो फिर स्वकेंद्र परीक्षा लागू की गई। 2007 में मायावती सरकार ने छात्रों के लिए स्वकेंद्र खत्म कर दिए। अब योगी सरकार ने एंटी कॉपिंग एक्ट फिर से लागू किया।

शिक्षा नीति

1948- डॉ राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग का गठन। 1952-  लक्ष्मणस्वामी मुदलियार की अगुआई में माध्यमिक शिक्षा आयोग बना। 1964- दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में शिक्षा आयोग। 1968- कोठारी आयोग के सुझावों पर शिक्षा नीति का प्रस्ताव। 1986- नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू। 1990- आचार्य राममूर्ति की अध्यक्षता में एक समीक्षा समिति बनी। 1993- प्रो यशपाल के नेतृत्व में समीक्षा समिति का गठन। 2017- नयी शिक्षा नीति का प्रारूप बनाने के लिए कस्तूरीरंगन समिति का गठन हुआ।

(साभार दैनिक भास्कर)

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लंबे इंतजार के बाद नई शिक्षा नीति का मसौदा सामने आ गया, लेकिन यह अच्छा नहीं हुआ कि ऐसा होते ही हिंदी को लेकर एक अनावश्यक विवाद छिड़ गया। अब जब यह विवाद शांत हो गया है तब फिर जरूरी यह है कि नई शिक्षा नीति को प्राथमिकता के आधार पर लागू करने की दिशा में कदम उठाए जाएं।
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The Policy Times