सरकार ने अनुसूचित जाति-जनजाति के मूल प्रावधानों को बहाल क्या; भी राज्यों को भेजा नोटिस

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के लिए मोदी सरकार को जिम्मेदार मानते हुए दलित समाज केंद्र सरकार से अपनी नाराजगी जता रहा था. आपको बता दें कि इसी साल 21 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (एससी/एसटी एक्ट 1989) के तहत दर्ज मामलों में तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी.

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central Government has restored the provisions of scheduled castes and tribes
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दलित समुदाय की नाराजगी को देखते हुए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने SC/ST एक्ट को पुराने और मूल स्वरूप में ला दिया है. बुधवार 26 सितम्बर  को कैबिनेट की बैठक में SC/ST एक्ट संशोधन विधेयक के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई. माना जा रहा है कि सरकार इसी मॉनसून सत्र में इस संशोधन विधेयक को पेश करके फिर से एक्ट के मूल प्रावधानों के साथ बहाल करेगी.

आपको बता दें कि इसी साल 21 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (एससी/एसटी एक्ट 1989) के तहत दर्ज मामलों में तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी. कोर्ट के 2 जजों की पीठ (ए के.गोयल और जस्टिस ललित) ने फैसला देते हुए कहा था कि सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी सिर्फ सक्षम अथॉरिटी की इजाजत के बाद ही हो सकती है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के लिए मोदी सरकार को जिम्मेदार मानते हुए दलित समाज केंद्र सरकार से अपनी नाराजगी जता रहा था. केंद्र सरकार और बीजेपी को दलित विरोधी बताया जा रहा था. एससी\एसटी संशोधन विधेयक 2018 के जरिए मूल कानून में धारा 18A जोड़ी गयी है. इसके जरिए पुराने कानून को बहाल कर दिया जाएगा और सुप्रीम कोर्ट के किए प्रावधान रद्द हो चुकी है.

अब ये प्रावधान होगा

एससी/एसटी एक्ट में केस दर्ज होते ही गिरफ्तारी का प्रावधान है.आरोपी को अग्रिम जमानत नहीं मिल सकेगी,हाईकोर्ट से ही नियमित जमानत मिल सकेगी.
एससी/एसटी मामले में जांच इंस्पेक्टर रैंक के पुलिस अफसर करेंगे. जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल संबंधी शिकायत पर तुरंत मामला दर्ज होगा. एससी/एसटी मामलों की सुनवाई सिर्फ स्पेशल कोर्ट में होगी.
सरकारी कर्मचारी के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दायर करने से पहले जांच एजेंसी को अथॉरिटी से इजाजत नहीं लेनी होगी.

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एससी/एसटी एक्ट के मामलों में तुरंत गिरफ्तारी नहीं की जाएगी. शिकायत मिलने पर तुरंत मुकदमा दर्ज नहीं किया जाएगा. सबसे पहले शिकायत मिलने के बाद डीएसपी स्तर के पुलिस अफसर द्वारा शुरुआती जांच की जाएगी. जांच किसी भी सूरत में 7 दिन से ज्यादा समय तक न हो. डीएसपी शुरुआती जांच कर नतीजा निकालेंगे कि शिकायत के मुताबिक क्या कोई मामला बनता है या फिर किसी तरीके से झूठे आरोप लगाकर फंसाया जा रहा है? सुप्रीम कोर्ट ने इस एक्ट के बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल की बात को मानते हुए कहा था कि इस मामले में सरकारी कर्मचारी अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं. एससी/एसटी एक्ट के तहत जातिसूचक शब्द इस्तेमाल करने के आरोपी को जब मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाए, तो उस वक्त उन्हें आरोपी की हिरासत बढ़ाने का फैसला लेने से पहले गिरफ्तारी की वजहों की समीक्षा करनी थी. सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी सिर्फ सक्षम अथॉरिटी की इजाजत के बाद ही हो सकती है. दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करने वाले अफसरों को विभागीय कार्रवाई के साथ अदालत की अवमानना की कार्यवाही का भी सामना करना पड़ेगा.

भाजपा आरक्षण विरोधी:विपक्ष

इस बिल पर चर्चा में भाग लेते हुए कांग्रेस संसदीय दल के नेता मल्लिकर्जुन खडग़े ने भाजपा को दलित और आरक्षण विरोधी करार दिया। उन्होंने कहा कि इस सरकार के दिल में मनु है और यह अंबेडकर,फूले के नाम का ढोंग करती है। खडग़े ने सवाल किया कि आखिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निरस्त करने के लिए सरकार ने अध्यादेश का सहारा क्यों नहीं लिया? इस दौरान टीडीपी सांसद ने सरकार से पूछा कि दलित विरोधी निर्णय करने वाले जस्टिस एके गोयल के खिलाफ सरकार ने महाभियोग लाने का साहस क्यों नहीं दिखाया? उन्हें एनजीटी का अध्यक्ष बना कर उपकृत क्यों किया गया? दलित संगठनों की मांग थी कि एससी-एसटी एक्ट में किए गए बदलावों में ख़त्म किया जाए और उसे उसके पुराने स्वरूप में फिर से बहाल किया जाए.

हाल के वक्त में दलितों पर हुए हमले बढ़े हैं और एससी-एसटी एक्ट के कमज़ोर होने को भी इससे जोड़ कर देखा जा रहा है.दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढ़कर न जाने देने, दलित सरपंच को स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस पर तिरंगा न फहराने देने और मिडडे मील के वक्त दलित छात्रों को अलग बैठाये जाने जैसी घटनाएं भी उनकी मानवसुलभ संवेदनाओं को नहीं जगा पातीं.

दलितों पे हो रहे लगातार अत्तयचार पर  एनसीआरबी की रिपोर्ट

एससी/एसटी)अधिनियम के खिलाफ अपराधों के 2017 एनसीआरबी आंकड़ों के अनुसार, 2015 और 2016 के बीच दलितों के खिलाफ अपराध 5.5% (38,670 से 40,801 तक) और एसटी के खिलाफ 4.5% (6,276 से 6,568 तक) की वृद्धि हुई।

बलात्कार और “अपनी विनम्रता को अपमानित करने के इरादे से महिलाओं पर हमला” एससी और एसटी के खिलाफ अत्याचारों की सबसे बड़ी संख्या गठित की गई। 2016 में, दलित महिलाओं की सबसे ज़्यादा बलात्कार घटना यूपी में (557) थी, जबकि मध्य प्रदेश (377), छत्तीसगढ़ (157), और ओडिशा (9 1) में आदिवासी महिलाओं के बलात्कार के खिलाफ किए गए सभी अपराधों में से 10% पूरे देश में एसटीएस।
एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, एससी के खिलाफ अपराधों के लिए 2010 में कन्वर्शन दरों में 38% की गिरावट आई और एससी के खिलाफ अपराधों के लिए 2016 में 16% और 2010 में 26% से एसटी के खिलाफ अपराधों के लिए 2016 में 8% हो गई।

विकास के अर्थ को सिर्फ और सिर्फ असमानताओं के विकास तक सीमित कर देते और उसमें सौहार्द, व्यक्ति की गरिमा व राष्ट्र की एकता व अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता (जो अपने आप में एक संवैधानिक संकल्प है)और सामाजिक समझदारी के लिए कोई जगह न रहने देते?

ऐसे में यह भी साफ ही है कि अनेक ‘शुभचिंतक’ दलों के बावजूद भेदभावों के खिलाफ दलितों की लड़ाई अभी भी लंबी है. इसलिए कि ये शुभचिंतक दल दलितों के वोट तो पाना चाहते हैं, पर न उन पर हो रहे अत्याचारों के, जिनमें से कई का रूप इतना बदल गया है कि अब वे अत्याचार लगते ही नहीं हैं, कारणों से मुठभेड़ करना चाहते हैं और न उनके लिए कोई जोखिम उठाने को तैयार हैं.

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The Policy Times
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