भारत में एक दशक में 1 करोड़ 25 लाख हुए बाल विवाह, राजस्थान की हालत सबसे बुरी

2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 1.25 करोड़ लोग बाल विवाह का दंश झेल रहें है जिसमें देश के करीब सात राज्यों की स्थति इस मामले काफी भयावह है जिसके अंतर्गत राजस्थान, बिहार, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की हालत सबसे ज्यादा ख़राब है|

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Child marriage
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पिछले दौर की तुलना में आज भारत सामाजिक और आर्थिक दृष्टी में बहुत आगे निकल चूका है परंतु विडंबना यह है कि आज भी भारत में कई सारी सामाजिक बुराइयां ऐसी है जो अपनी जड़ें बनाई हुई है| भारत के संदर्भ में देखे तो हर राज्य और प्रांत में सामाजिक बुराई की जड़ें है लेकिन देश का एक ऐसा राज्य जो एतिहासिक दृष्टि से काफ़ी संपन्न है लेकिन सामजिक आएने में तौले तो वह राज्य पुरे भारत में सबसे पिछड़े राज्य के रूप में देखा जाता है|

हम बात कर रहे ‘वीरों की भूमि’ राजस्थान की| वैसे राजस्थान के कुछ प्रांत और कस्बें को छोड़कर शेष देशी रियायतों पर राजा-महाराजाओं का ही शासन रहा किंतु सच्चाई ये भी है कि अन्य राज्यों की तुलना में यह राज्य सामजिक दृष्टी से प्रारंभ से ही पिछड़ा रहा है| यहाँ सामंतवाद और जाति प्रथा शुरू से प्रचलित रही| समाज की रीढ़ यानी महिलाओं की स्थति पर बात करें तो प्राचीन दौर से ही इस वर्ग को दबाया और कुचला गया है और यह आज भी राजस्थान के कई गाँवों और कस्बों में प्रचलित है|

बाल विवाह प्रथा–

बाल विवाह सामाजिक कुरीति होने के साथ-साथ बच्चों के मानवधिकारों का हनन भी है| उम्र से पहले बच्चों की शादी के बढ़ते मामले को देखते हुए सरकार ने देशभर में बाल विवाह पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है बावजूद इसके यह कुरीति आज भी चलन में है| अगर आंकड़ों की ओर देखें तो 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 1.25 करोड़ लोग बाल विवाह का दंश झेल रहें है जिसमें देश के करीब सात राज्यों की स्थति इस मामले काफी भयावह है जिसके अंतर्गत राजस्थान, बिहार, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की हालत सबसे ज्यादा ख़राब है|

वहीँ, राजस्थान के बाद बाल विवाह के मामले में महाराष्ट्र का नंबर आता है| महाराष्ट्र के पूर्वोत्तर भंडारा जिले में कम उम्र में लड़कियों की शादी के मामलों में पांच गुना से ज्यादा वृद्धि देखि गई है जबकि राज्य के सभी 16 जिलों में कम उम्र में लड़कों की शादी के मामलों में वृद्धि देखी गई है| यहां पिछले एक दशक से 2011 तक लड़कों के अल्प आयु में विवाह होने में मामलों में 21 गुना वृद्धि देखी गई है|

राजस्थान की हालत सबसे बुरी

वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, 10 से 17 वर्ष की लड़कियों के विवाह होने की घटनाओं के संबंध में देश भर के टॉप 20 जिलों में से सात राजस्थान में थे| इनमें से सबसे ऊपर भीलवाड़ा का दक्षिणी जिला है| यहां 10 से 17 वर्ष की आयु की 37 फीसदी लड़कियों के साथ-साथ ग्रामीण जिलों में भी, 10 से 17 वर्ष की आयु की 40 फीसदी लड़कियों का विवाह कानूनी उम्र से पहले हुआ है|

कानूनी उम्र से पहले लड़कों के विवाह के मामले में भी राजस्थान का प्रदर्शन सबसे बद्तर रहा है| राज्य के नौ जिले टॉप 20 बाल विवाह जिलों की सूची में शामिल हैं| कानूनी उम्र से पहले लड़कों के विवाह के मामले में भीलवाड़ा का स्थान सबसे ऊपर है| वर्ष 2011 में भीलवाड़ा में 10 से 20 वर्ष की आयु के 20.2 फीसदी लड़कों की शादी हुई है|

लड़कियों का विवाह सबसे अधिक क्यों?

अगर बाल विवाह से जुड़े आंकड़ों पर गौर करें तो सबसे अधिक लड़कियों के बाल विवाह की घटनाएं सामने आती है| लड़कियों की शादी से जुड़े कुछ मुख्य मुद्दों में मासिक धर्म, गरीबी, शिक्षा की कमी, जाति, जन्म संख्या, और परिवार का आकार (अगर बड़े भाई और बहन हैं, तो लड़की की कम उम्र में शादी होने की संभावना कम है) पितृसत्तात्मक परिवार, और शिक्षा, रोजगार, कामुकता और यौन व्यवहार के मामलों में लड़कियों के खिलाफ सांस्कृतिक और लैंगिक भेदभाव आदि लड़कियों के बाल विवाह के बड़े कारणों के रूप में माने जाते है|

क्या कहता है कानून?

बालविवाह को रोकने के लिए इतिहास में कई लोग आगे आए जिनमें सबसे प्रमुख राजाराम मोहन राय, केशबचन्द्र सेन जिन्होंने ब्रिटिश सरकार द्वारा एक बिल पास करवाया जिसे स्पेशल मैरिज एक्ट कहा जाता था| इसके अंतर्गत शादी के लिए लडको की उम्र 18 वर्ष एवं लडकियों की उम्र 14 वर्ष निर्धारित की गई थी लेकिन नए कानून यानी ‘बाल विवाह निषेध कानून’ के तहत लडको की उम्र बढ़ाकर 21 वर्ष और लडकियों की उम्र बढ़ाकर 18 वर्ष निर्धरित की गई है|

सरकार द्वारा इसे रोकने के कई प्रयत्न किए गए और कई क़ानून बनाए गए जिसमें कुछ हद तक सुधार आया परन्तु ये पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुआ है|

सरकार द्वारा कुछ क़ानून बनाए गए हैं जैसे बाल-विवाह निषेध अधिनियम 2006 जो अस्तित्व में हैं| ये अधिनियम बाल विवाह को आंशिक रूप से सीमित करने के स्थान पर इसे सख्ती से प्रतिबंधित करता है| इस कानून के अन्तर्गत, बच्चे अपनी इच्छा से वयस्क होने के दो साल के अंदर अपने बाल विवाह को अवैध घोषित कर सकते है किन्तु ये कानून मुस्लिमों पर लागू नहीं होता जो इस कानून का सबसे बड़ी कमी है|

हालांकि, वर्ष 2011 तक एक दशक के दौरान, कुल बाल विवाह के दर में गिरावट हुई है, लेकिन राजस्थान के 13 जिलों में से एक –बंसवाड़ा- अब भी इस रैंकिंग में शामिल है।

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2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 1.25 करोड़ लोग बाल विवाह का दंश झेल रहें है जिसमें देश के करीब सात राज्यों की स्थति इस मामले काफी भयावह है जिसके अंतर्गत राजस्थान, बिहार, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की हालत सबसे ज्यादा ख़राब है|
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The Policy Times