यूपी में कैसे एक मदरसा बन गया ‘ऑक्सफ़ोर्ड स्कूल’…

उत्तरप्रदेश के फरीदपुर शहर में स्थित मदरसा, जिसे आमतौर पर 'ऑक्सफोर्ड स्कूल' कहा जाता है। यह ऐसे तमाम मदरसा-कम-स्कूल में से एक है, जो हाल ही में यूपी में अस्तित्व में आए हैं।

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how a madarsa became a model of oxford school in uttar pradesh
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उत्तरप्रदेश के फरीदपुर शहर में स्थित मदरसा, जिसे आमतौर पर ‘ऑक्सफोर्ड स्कूल’ कहा जाता है। यह ऐसे तमाम मदरसा-कम-स्कूल में से एक है, जो हाल ही में यूपी में अस्तित्व में आए हैं। पारंपरिक मदरसा के विपरीत जहां कुर्ता-पायजामा पहने हुए छात्र कालीन पर बैठते हैं और कुरान, उर्दू एवं फारसी को मुख्य कोर्स के रूप में सीखते हैं, वहीँ बच्चों को अंग्रेजी, विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान, कंप्यूटर साइंस और अन्य विषयों की भी तालीम  दी जाती है|

गुलशन-ए-रिज़वान मदरसे के मालिक रहील खान कहतें है कि यहाँ ज्यादातर गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जाती हैं। वे कहते हैं, “हम नहीं चाहते हैं कि हमारे बच्चें आधुनिक शिक्षा से वंचित रहें, इसलिए हम इस तरह के कार्यक्रम की योजना बनाते हैं, ताकि उनके पास दोनों तरह की शिक्षा के लिए पर्याप्त समय हो। इसके साथ ही छात्रों को एनसीईआरटी (NCERT) किताबों और सीबीएसई (CBSE) स्कूलों की स्तर की शिक्षा दी जाती है|

मौलाना मोहम्मद सलीम खान, इनके दोनों बच्चे ऑक्सफोर्ड स्कूल में पढ़ते हैं| यें क्लर्क की नौकरी करते है| वें कहते हैं, “हम चाहते हैं हमारे बच्चे इस्लामी कानून के बारे में जान सकें, उनके लिए मुख्यधारा में रहना और उनकी उम्र के अन्य बच्चों के साथ प्रतिस्पर्धा करना भी ज़रूरी है। आज यह आधुनिक मदरसे धार्मिक और आधुनिक शिक्षा के बीच ब्रिज का काम कर रहें हैं। ”

उत्तरप्रदेश के ऐसे सभी मॉडर्न मदरसा ‘यूपी बोर्ड ऑफ मदरसा एजुकेशन’ से जुड़ा हैं| साथ ही इन मदरसों का पूरा सिलेबस सीबीएसई पैटर्न फॉलो करता हैं।

बरेली के अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी जगमोहन सिंह कहतें हैं कि यूपी सरकार ने वर्तमान सत्र से मदरसे में एनसीईआरटी किताबों को अनिवार्य कर दिया है। यूपी के आधे से भी कम मदरसे केंद्र की आधुनिकीकरण योजना द्वारा कवर किए जाते हैं| आगे उन्होंने बताया कि मदरसे में क्वालिटी एजुकेशन प्रदान करने की योजना आज से आठ साल पहले शुरू की गई थी|

हालांकि यूपी के कई और मदरसे भी है, जो अपने संसाधनों का उपयोग कर परिवर्तन ला रहें हैं। एम चिल्ड्रेन अकादमी, बरेली के नाकातिया इलाके में स्थित इस मदरसे में प्रत्येक कक्षा में अनुभवी और योग्य शिक्षक है| साथ ही सीसीटीवी कैमरे से लेस इस कैंपस में बच्चों के लिए लाईबरेरी, कंप्यूटर की भी व्यवस्था है|

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इस अकादमी में कुल 220 छात्र है| जिसमें लगभग 10% गैर-मुसलमान हैं। संस्था के प्रमुख अब्दुल कदीर कहते हैं, “हम केवल 200 रूपए  प्रति माह शुल्क लेते हैं, इसलिए हम गैर-मुस्लिम छात्रों को भी शिक्षा की ओर आकर्षित करते हैं क्योंकि कम फीस होने की वजह से यह उन माता-पिता के लिए भी मददगार है जो अपने बच्चों को अंग्रेजी-माध्यमिक शिक्षा प्रदान कराना चाहते हैं।”

कक्षा दसवी के छात्र मोहम्मद मिराज कहते हैं, “मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे डॉक्टर बनने का सपना पूरा होगा क्यूंकि मुझे यहाँ उचित शिक्षा मिल रही है।”

अकादमी के पूर्व छात्र जावेद खान, जिन्होंने इसी अकादमी से अपनी स्कूली शिक्षा ग्रहण की थी| इसके बाद वर्ष 2016 में दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में उन्हें प्रवेश मिला, और वर्तमान में कंप्यूटर इंजीनियरिंग में तीन साल का डिप्लोमा कोर्स कर रहें है।

मदरसा गुलशाने खुर्शीद, जिसमें 17 शिक्षक और 650 छात्र हैं| यहाँ प्रमुख रूप से फिजिकल एजुकेशन की शिक्षा दी जाती है| प्रिंसिपल फरज़ंद अली का कहना है कि उनके पास लड़कियों और लड़कों दोनों के लिए व्यायाम और खेल की कक्षाएं हैं| साथ ही योग क्लासेस भी शुरू करने की योजना बनाई जा रही हैं।

संभल में मौलाना मोहम्मद अली जौहर पब्लिक स्कूल, यहां छात्रों को अंग्रेजी में कुरान और हदीस सिखाया जाता है। इसके प्रबंधक फिरोज़  खान कहते हैं, “हम चाहते हैं कि हमारे छात्रों को सभी भाषाओं और विषयों का ज्ञान हो। हम अपने शिक्षण विधियों का आधुनिकीकरण कर रहे हैं ताकि हमारे बच्चें मदरसा छोड़ने के बाद किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकें। ”

चांदौली में सन फ्लॉवर आधुनिक उर्दू अरबी कॉलेज, छात्रों के पास उर्दू या संस्कृत चुनने का विकल्प होता है, जबकि सुन्नी/शिया धर्मशास्त्र कक्षा नवमी और दसवी में अनिवार्य है। यहाँ 180 छात्रों में से 90 गैर-मुसलमान हैं। प्रबंधक अब्दुल हसीब कहते हैं, “जैसा कि हम सभी विषयों को पढ़ाते हैं और नियमित रूप से परीक्षाएं आयोजित करते हैं| इसके साथ ही सभी धर्मों के छात्र यहां आते हैं।”

मदरसों की बदलती प्रोफाइल छात्रों के जीवन में नए बदलाव ला रही है। चंदौली मदरसा में कक्षा सातवीं छात्र ज़ोया समीन कहती हैं कि कुछ साल पहले तक उन्हें सुबह में एक नियमित स्कूल और शाम को मदरसा जाना पड़ता था। “अब मुझे यहां दोनों प्रकार के पाठ्यक्रम सिखाए जाते हैं, इसलिए मेरे पास शाम को खेलने का समय है।”

इसके अलावा, अरमान बेग के माता-पिता के लिए, यह गर्व की बात है कि उनका बेटा ऐसे मदरसा में जाता है जहां शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है। पिता, यूनुस बेग एक मजदूर हैं और प्रति दिन 200 रूपए कमातें हैं, जबकि उनकी मां सोना बेगम कारीगर का काम करतीं  हैं और पांच दिनों में 150 रूपए कमातीं हैं। उनके माता-पिता दोनों अशिक्षित हैं।

अरमान ने कहा है, पहले वो सुबह और शाम एक घंटे के लिए मदरसा जाते थे, जहाँ उन्हें दीन और हदीस की तालीम मिलती थी| वो एक सरकारी स्कुल में थे, जहाँ उन्होंने कक्षा तीसरी तक पढाई की| वे पढाई में कमज़ोर थे और शिक्षक भी उन पर ध्यान नहीं देते थे| लेकिन जब उनके माता-पिता को आधुनिक मदरसे के बारे में पता चला तो बिना समय गवाएं एडमिशन करवा लिया|

राष्ट्रीय सामान्य सचिव मौलाना शाहबुद्दीन रज्वी का कहना है कि यदि वे आधुनिक शिक्षा के साथ धार्मिक ग्रंथों पर उचित कक्षाएं दे रहें हैं, तो उन्हें आधुनिक मदरसों के साथ कोई समस्या नहीं है। “हम चाहते हैं कि हमारे समुदाय के बच्चों को कंप्यूटर और अंग्रेजी की प्रवीणता हासिल हो। साथ ही छात्रों को भविष्य में धार्मिक क्षेत्र के बाहर रोजगार का बेहतर विकल्प मिले।’’

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उत्तरप्रदेश के फरीदपुर शहर में स्थित मदरसा, जिसे आमतौर पर 'ऑक्सफोर्ड स्कूल' कहा जाता है। यह ऐसे तमाम मदरसा-कम-स्कूल में से एक है, जो हाल ही में यूपी में अस्तित्व में आए हैं।
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