जानिए कारन की देश का हर चौथा ‘भिखारी’ मुसलमान क्यों है?

नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया के अध्ययन के मुताबिक, प्रत्येक 4 में से एक मुसलमान गरीब है| देश के सभी धार्मिक समुदायों में मुसलमान सबसे ज्यादा गरीब हैं| उनकी स्थिति दलितों और आदिवासियों के मुकाबले थोड़ा बेहतर है|

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Know why every fourth 'beggar' in the country is a Muslim?
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नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया के अध्ययन के मुताबिक, प्रत्येक 4 में से एक मुसलमान गरीब है| देश के सभी धार्मिक समुदायों में मुसलमान सबसे ज्यादा गरीब हैं| उनकी स्थिति दलितों और आदिवासियों के मुकाबले थोड़ा बेहतर है|

इस्लामिक उम्मत दुनिया के सारे मुसलमानों को एक बताता है| यानी इसके मानने वाले सब एक हैं| लेकिन, भारतीय मुसलमान जिस तरह आपस में बंटे हुए हैं| वो इस्लाम के इस बुनियादी उसूल को ही नकारता है| हिंदुस्तान में मुसलमान, सुन्नी, शिया, बोहरा, अहमदिया और न जाने कितने फ़िरक़ों में बंटे हुए हैं|

आज़ादी के सत्तर साल के बाद भी मुस्लिम समाज विकास की ड्योढ़ी से कोसो दूर है| टू-नेशन थ्योरी को रिजेक्ट करने वाले मुसलमान आज भी समाज में मेनस्ट्रीम में आने की जद्दोजहद कर रहें हैं| लेकिन इन सत्तर साल में मुस्लिम सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गया है| जिस समाज की ज़रूरत आम आदमी के मसाइल से मिलता जुलता है| लेकिन मुस्लिम के मसले हमेशा पेंचीदा बने हुए है| सत्तर साल के बाद मुस्लिम ट्रिपल तलाक और निकाह हलाला जैसे मसले पर उलझा हुआ है| उसको नए सिरे से घेरने की कोशिश होती है| जो जाल उस पर फेंका जाता है| उससे वो निकल नहीं पाता है| हालांकि मुस्लिम समाज की सबसे बड़ी ज़रूरत रोटी कपड़ा के बाद शिक्षा की है|

सिगनल पर भीख मांगते भिखारियों से आपका कभी ना कभी वास्ता जरूर पड़ा होगा। भारत के बड़े शहरों में अक्सर आपको भीड़भाड़ वाली जगहों पर भिखारी मिल ही जाते होंगे। ऐसे में आपके दिमाग में ये बात भी आती होगी कि भारत में कितने भिखारी है? सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश में भिखारियों की जनसंख्या 3.7 लाख है।

सरकारी आंकड़े में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है और वो ये कि भिखारियों की कुल जनसंख्या में हर चौथा भिखारी मुसलमान है। यानी भिखारियों की कुल जनसख्या में 25 फीसदी मुस्लिम हैं। आंकड़ो के मुताबिक भिखारियों में से 72.2 फीसदी हिंदू हैं और कुल जनसंख्या में उनकी हिस्सेदारी 79.8 फीसदी है।

हालांकि साल 2001 में सरकार द्वारा की गई जनगणना के मुताबिक उस वक्त देशभर में भिखारियों की जनसंख्या 6.3 लाख थी जिसमें कमी आई है। इसके अलावा धार्मिक आधार पर आंकड़ो की बात करें तो भारत की आबादी में ईसाईयों की जनसंख्या 2.3 फीसदी है और भिखारियों की जनसंख्या 0.88 फीसदी है। इसके अलावा कुल 3.7 लाख भिखारियों में 0.25 फीसदी बौद्ध, 0.45 फीसदी सिख और 0.06 फीसदी जैन हैं।

आंकड़ो के मुताबिक मुस्लिम भिखारियों में महिलाओं की जनसंख्या सबसे ज्चादा है जबकि बाकी धर्में के भिखारियों में मर्द ज्यादा हैं। औसतन कुल भिखारियों में 53.13 फीसदी पुरुष हैं और 465.87 फीसदी महिलाए हैं जबकि मुस्लिम भिखारियों में 43.61 फीसदी पुरुष और 56.38 फीसदी महिलाए हैं।

देश में कानून का हाल

और इन हालात में सबसे खतरनाक तो सरकारी कानून है| भीख मांगना भारत में गैरकानूनी है और इसके लिए 3 से 10 साल तक की सजा हो सकती है| देश के लगभग सभी प्रदेशों में ‘द बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ बेगिंग एक्ट, 1959’ लागू है| इस क्षेत्र में काम करने वाले एक्टिविस्ट इस कानून के खिलाफ रहे हैं| उनका कहना है कि इसमें भीख मांगने वालों का स्पष्ट कैटेगराइजेशन नहीं है| बल्कि, अपना गांव-घर छोड़कर शहरों में फुटपाथ पर सोने वाले बेघर मजदूरों को भी इसके तहत भिखारी माना गया है|

3.7 लाख तो आंकड़ों में दर्ज हैं. पुलिस चाहे तो देश में लाखों लोगों को जेल में डाल सकती है और उन्हें 3 से 10 साल जेल में बिताने पड़ सकते हैं|

रोज़गार के मसले भी हैं

मुसलमानों के अनपढ़ रह जाने की वजह ये भी है| रोज़गार के अवसर ना के बराबर है| संगठित क्षेत्र में रोज़गार के अवसर काफी कम है| मुसलमानों की तादाद सरकारी नौकरियों में कम हो रही है| आलम ये है कि आईएएस में 3 फीसदी हिस्सेदारी मुसलमानों की है| इस तरह रेलवे में 4.5 फीसदी तो पुलिस में सिर्फ़ 6 फीसदी है| ज़ाहिर है कि सरकारी नौकरी ना मिलने की वजह से मुसलमानों में पढ़ने की ललक कम हुई है| ये गिरावट एक दिन में नहीं आई है| बल्कि सतत् चल रहा है| किसी सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया है| सरकारी वर्कफोर्स के आंकड़े बता रहें हैं कि मुस्लिम की भागीदारी 32 फीसदी है| जो औसत से दस फीसदी से ज़्यादा कम है| इसका कारण भी समझ आ रहा है| कई लोग राजनीतिक कारण गिनाते है|

राजनीति में भागीदारी भी के बराबर

2014 में मोदी लहर की वजह से सबसे कम तादाद में मुस्लिम लोकसभा का मुंह देख पाए है| ऐसा नहीं है इससे पहले सरकार में मुसलमानों की भागीदारी बहुत ज्यादा थी| वर्तमान सरकार में जो बीजेपी की अगुवाई में चल रही है| दो मुस्लिम मंत्री हैं| यूपीए दो में भी तादाद ज्यादा नहीं थी| यूपीए के पहले कार्यकाल में ज़रूर मुस्लिम नुमाइंदगी बढ़ी थी लेकिन उसका कारण रीजनल पार्टियां थी| मसलन आरजेडी या छोटे दल, ज़ाहिर है इसलिए उत्तर भारत में मुसलमान नेशनल पार्टियों की जगह क्षेत्रीय दलों को तरजीह दे रहा है| लेकिन इसकी वजह से मुसलमान को राजनीति में भागीदारी नहीं मिल पा रही है| बल्कि वो वोट बैंक की तरह इस्तेमाल हो रहा है|

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नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया के अध्ययन के मुताबिक, प्रत्येक 4 में से एक मुसलमान गरीब है| देश के सभी धार्मिक समुदायों में मुसलमान सबसे ज्यादा गरीब हैं| उनकी स्थिति दलितों और आदिवासियों के मुकाबले थोड़ा बेहतर है|
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The Policy Times