आरटीआई रैंकिंग: भारत छठे पदान पे लुढ़का, अफ़ग़ानिस्तान नंबर 1 पर

दुनिया के प्रमुख 123 देशों में आरटीआई कानून है| भारत इस मामले में अब श्रीलंका, मेक्सिको और अफगानिस्तान से भी पीछे हो गया है|  इस सूची में अफगानिस्तान इस साल पहले पायदान पर आ गया है|

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नरेंद्र मोदी के शासनकाल में सूचना का अधिकार (आरटीआई) रैंकिंग में भारत की स्थिति में काफी गिरावट दर्ज की गई है। मनमोहन सरकार में आरटीआई रैंकिंग में जहां भारत दूसरे स्थानपर था वहीं मोदी सरकार में अब भारत खिसकर छठे स्थान पर पहुंच गया है। इसका सीधा मतलब यह समझ लीजिए की भारत में आरटीआई कानून पहले के मुकाबले कमजोर हुआ है। विदित हो कि साल 2011 में आरटीआई पर ग्लोबल रेटिंग की शुरूआत हुई थी।

दुनिया के प्रमुख 123 देशों में आरटीआई कानून है| सेंटर फॉर लॉ एंड डेमोक्रेसी (कनाडा) और स्पेन की संस्था एक्सेसइन्फो यूरोप ने बीते दिनों 28 सितंबर को इंटरनेशनल राइट टू नो (जानने का अधिकार) डे के दिन इन सभी देशों की रैकिंग जारी की थी|  जिसमें भारत को पिछले साल की तुलना में नुकसान उठाना पड़ा है| खास बात है कि जिन देशों को भारत से ऊपर स्थान मिला है उनमें ज्यादातर देश भारत के बाद इस कानून को अपने यहां लागू किया हैं| भारत इस मामले में अब श्रीलंका, मेक्सिको और अफगानिस्तान से भी पीछे हो गया है|  इस सूची में अफगानिस्तान इस साल पहले पायदान पर आ गया है|

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, पिछले साल यानी 2017 में भारत इस रैंकिंग में पांचवें स्थान पर था, लेकिन ऐसालगता है कि भारत सूचना के अधिकार के मामले में अब पिछड़ता जा रहा है|

क्यों फिसला भारत

इसके लिए सर्वे करने वाली ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया के मुताबिक भारत में केंद्रीय सूचना आयुक्त कार्यालय सहित कई राज्यों में सूचना आयुक्तों के कार्यालयों में खाली पदों पर भर्ती नहीं हो पा रही | इनमें सूचना आयुक्तों के 156 में से 48 पोस्ट खाली हैं| इसके अलावा हाल में आरटीआई एक्ट में बदलाव की कोशिश से भी लोगों में नाराजगी है|  संस्था नेआरटीआई एक्ट से जुड़े तीन महत्वपूर्ण सेक्शन, मसलन 25(2), सेक्शन 19(1) और सेक्शन 19(2) पर फोकस कर रिपोर्ट पेश की है|

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सेंटर फॉर लॉ एंड डेमोक्रेसी नामक संस्था आरटीआई लागू करने वाले सभी देशों के यहां बने कानूनों और उसके पालन की हर साल समीक्षा करती है| जिस देश का कानून ज्यादा मजबूत होता है, जहां सूचनाएं छिपाने की जगह अधिक से अधिक सूचनाएं पब्लिड डोमन में सरकारी विभाग और मंत्रालय रखते हैं, जहां आरटीआई आवेदन से पहले ही सरकारी संस्थाओं की ओर से जरूरी सूचनाएं वेबसाइट पर उपलब्ध रहतीं हैं, उन देशों की रैकिंग मजबूत होती है| भारत में सूचनान देने पर 2005-2016 के बीच 18 लाख से ज्यादा लोगों को सूचना आयोगों का दरवाजा खटखटाना पड़ा | इससे पताचलता है कि देश में सूचनाएं छिपाईं जातीं हैं | इसके अलावा भारत में सीबीआई सहित कई संस्थाएं आरटीआई के दायरे से बाहर हैं, वहीं गोपनीयता और निजता का हवाला देकर उन सूचनाएं को बाहर आने से रोका जाता है, जिनसे राष्ट्रीयसुरक्षा या व्यक्ति की निजता कतई भंग नहीं होती| इसके लिए आरटीआई कानून को कुछ उपबंधों को अफसर ढाल बनाते हैं| जबकि भारत से काफी बाद में अफगानिस्तान ने आरटीआई जैसा कानून बनाया, जिसमें सूचनाओं की सहज और सामान्य उपलब्धता जनता के लिए होती है| यहां तक कि श्रीलंका ने भी भारत से बाद में मगर बेहतर कानून बनाया और लागू किया है|

अफगानिस्तान से काफी पीछे हैं ‘हम’

ग्लोबल लेवल पर राइट टू नो के तहत जारी रैकिंग में भारत से कहीं छोटा अफगानिस्तान जैसा देश पहले स्थान पर है| अफगानिस्तान ने कुल 150 में से 139 प्वाइंट के साथ मैक्सिको को पीछे छोड़ नंबर 1 का तमगा हासिल किया है | खास बात है कि भारत ने आरटीआई कानून 2005 में बनाया था तो अफगानिस्तान ने नौ साल बाद यानी 2014 में इस पर अमल किया| बावजूद इसके कानून की खामियों और क्रियान्वयन में लापरवाहियों के चलते भारत को अफगानिस्तानसे पीछे छूटना पड़ा|

 

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आरटीआई रैंकिंग: भारत छठे पदान पे लुढ़का, अफ़ग़ानिस्तान नंबर 1 पर
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दुनिया के प्रमुख 123 देशों में आरटीआई कानून है| भारत इस मामले में अब श्रीलंका, मेक्सिको और अफगानिस्तान से भी पीछे हो गया है|  इस सूची में अफगानिस्तान इस साल पहले पायदान पर आ गया है|
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