हिजाब विवाद : लड़ाई ज़रूरत और समानता की

कर्नाटक के उडुपी में छह हिजाब पहने छात्राओं को कॉलेज में एंट्री नहीं देने के मामले ने तूल पकड़ लिया।

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हिजाब विवाद : लड़ाई ज़रूरत और समानता की

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट आत्मनिर्भर भारत के सफल होने में आवश्यक तत्व है शिक्षा और उसमें भी महिला शिक्षा सबसे आवश्यक तत्व है जिसको सशक्त कर हम आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य की प्राप्ति कर सकते हैं यानी शिक्षा के माध्यम से महिला सशक्तिकरण का रास्ता आत्मनिर्भर भारत की ओर जाता है शिक्षा प्राप्त महिला खुद आत्मनिर्भर बन अपनी आने वाली नस्लों को भी शिक्षा प्रदान कर आत्मनिर्भर बनाएगी क्योंकि एक मां अपने बच्चे का सबसे पहला शिक्षण संस्थान होती है यानी किसी भी कारण से महिला शिक्षा में बाधा सशक्त राष्ट्र निर्माण और आत्म निर्भर भारत में बाधा है.

कर्नाटक के उडुपी में छह हिजाब पहने छात्राओं को कॉलेज में एंट्री नहीं देने के मामले ने तूल पकड़ लिया।

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  • कॉलेज का तर्क था यूनिफॉर्म का मतलब होता है सभी छात्र- छात्राओं को एक जैसा दिखना इससे स्कूल का अनुशासन और स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता का पता लगता है।
  • दूसरी तरफ मुस्लिम छात्राओं का कहना है कि घूँघट हो या हिजाब, इन प्रथाओं से मतभिन्नता ठीक है, पर इसे आधार बना कर आप किसी महिला का संवैधानिक हक नहीं छीन सकते. कोई भी नीति-नियम संविधान के दायरे में ही हो सकता है. कोई भी नियम धार्मिक स्वतंत्रता एवं शिक्षा के संवैधानिक अधिकार के रास्ते में नहीं आ सकता. हम बचपन से ही हिजाब पहनते आए है और अनुच्छेद 25 26 27 28 हमें अपनी धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है।

8 फरवरी को कर्नाटक के शिक्षण संस्थानों में हिजाब के खिलाफ, भगवा स्कार्फ के प्रदर्शन के मुस्लिम विरोध की प्रतीक बन गई बीबी मुस्कान ख़ान का कहना है कि, ‘हम कोई सांप्रदायिकता पैदा नहीं कर रहे हैं. मैं सिर्फ अपने अधिकार, अपनी शिक्षा के लिए लड़ रही हूं. चंद सेकेंड के वीडियो से सेलिब्रिटी बनी बीबी मुस्कान ख़ान का कहना है कि बहुत सालों से हम हिजाब करते आ रहे हैं. किसी को ये अधिकार नहीं है कि हमें उसे हटाने के लिए कहे’.

  • क्या पुरुषप्रधान सामाजिक व्यवस्था में औरत की कहीं सुनवाई है ?
    ईरानी लड़कियां अपने समाज से बाहर निकल कर फुटबॉलर बन रही थीं ईरान की महिला फुटबॉल टीम को साल 2012 में ओलिंपिक क्वालिफ़ायर मुक़ाबले खेलने से मना कर दिया गया. फ़ीफ़ा ने 2007 में सुरक्षा के नाम पर कान और सिर ढंकने पर रोक लगा दी थी एक छोटा सा समझौता उन लड़कियों को बहुत आगे ले जा सकता था जिसे ठोकर मार उन लड़कियों ने महिला सशक्तिकरण का असली परिचय दिया फलस्वरूप जॉर्डन की टीम को विजेता घोषित कर ईरानी लड़कियों को वापस घर भेज दिया गया.

वर्तमान परिस्थिति को देखकर ऐसा लगता है कि महिला सुरक्षा जैसी बातें केवल एक मज़ाक बन कर रह गया है एक तरफ हम महिला सुरक्षा, महिला सशक्तिकरण, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का ढोल पीटते नज़र आते हैं और दूसरी तरफ रोज़ के अखबार महिला अत्याचार से भरे हुए होते हैं भाजपा शासित प्रदेश हो या कांग्रेस शासित प्रदेश, बलात्कार जैसी घटनाएं आम बात है अगर भाजपा शासित राज्य में ऐसी घटना होती है तो दूसरे दल उस घटना को लेकर हल्ला बोलते हैं ठीक उसी तरह अगर गैर भाजपा शासित राज्य में घटना होती है तो भाजपा उस घटना को लेकर बवाल काटती है जैसे मानो कि हर विपक्षी पार्टी अपने राज्य में किसी महिला अत्याचार के इंतज़ार में रहती है जिससे कि सत्ता पक्ष पर धावा बोलने का उसे मौका मिल जाए मतलब नारी उत्पीड़न की इन घटनाओं का भी राजनैतिक लाभ लिया जाता है और कोई भी दल इस अवसरवादिता से अछूता नही है.

  • चुनावी जिन्न
    अब बात हिजाब मामले की करें तो ये केवल चुनावी जिन्न है ऐसा जिन्न जो अक्सर चुनाव से पहले बोतल से बाहर आता है और फिर वापस बोतल में बंद हो जाता है ठीक उसी तरह जिस तरह कुछ साल पहले राज्य चुनाव के समय मॉब लिचिंग की घटनाएं अपने चरम पर थी और चुनाव खत्म होने के बाद ये घटनाएं अचानक से ऐसे बंद हो गई जैसे किसी ने बटन दबा कर बंद कर दिया हो. इसलिए हिजाब मामले में शांति और सद्भाव से काम लेने की आवश्यकता है वर्तमान शिक्षा सत्र समाप्ति की ओर है लड़कियां/महिलाएं हिजाब, घूंघट, पर्दे का इस्तेमाल अनगिनत सालों से करती आ रही है लेकिन अचानक एक बड़े प्रदेश में चुनाव होने से पहले हिजाब मुद्दा तेज़ी से तूल पकड़ता है हो सकता है कि चुनाव बाद ये जिन्न भी अचानक से बॉटल में बंद हो जाए.
  • समाधान
    अगर मामला समान ड्रेस कोड का हो तो उसके निराकरण के भी कई रास्ते हैं जैसे शिक्षण संस्थान द्वारा केवल काले या सफेद रंग के हिजाब की अनुमति दी जाए या उस रंग के हिजाब की अनुमति दी जाए जो ड्रेस कोड का रंग हो जिससे संस्थान के लिए छात्राओं का एक जैसा दिखना या स्कूल अनुशासन और गुणवत्ता का मकसद भी पूरा हो जाएगा.
  • तर्क
    अगर हम दिल्ली या शहरी इलाकों की बात करें तो छात्राएं स्कर्ट मे स्कूल जाती हैं । जिससे ना तो छात्राओं को कोई दिक्कत है। और ना ही अभिभावकों को कोई दिक्कत है।लेकिन अगर ग्रामीण इलाकों की बात करें इसमें किसी भी धर्म की लड़की को स्कर्ट पहनने को कहा जाए तो वहां की छात्राएं और अभिभावकों को यह पसंद नहीं होगा। जैसे जैसे वहां मॉडर्न होगा वैसे-वैसे वे इसे पसंद कर सकती हैं। लेकिन अगर बच्चों पर यह जबरदस्ती थोपा जाए तो ज्यादातर लड़कियां पढ़ाई छोड़ सकती हैं। जो पीएम मोदी जी के नारे बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के एकदम उलट है। यही कारण है कि ग्रामीण इलाकों के सरकारी या प्राइवेट कॉलेज इसे नहीं थोपते। अगर ग्रामीण कॉलेज में जबरदस्ती किया जाए कि आपको स्कर्ट पहन कर आना होगा तो 90% लड़कियां अपनी पढ़ाई छोड़ सकती हैं। इसी तरह मुस्लिम छात्राओं को हिजाब की मनाही की जाएगी तो छात्राओं और अभिभावकों को यह पसंद नहीं होगा।
  • उद्देश: समानता या प्रेस्टीज प्वाइंट
    हिंदूवादी संगठनों का तर्क है कि स्कूल मे समानता होना जरूरी है। कई सालों से जिन चीज़ों से किसी को कोई समस्या नहीं थी अचानक ऐसा क्या हुआ कि हिजाब विरोधियों के लिए ये प्रेस्टीज प्वाइंट बन गया ? अब अगर हम कॉलेज में एंट्री करने पर सिखों का अविभाजित अंग पगड़ी को उतारने के लिए कहे तो यह समानता में आएगा या ओछेपन में ? उनके पगड़ी पहनने से किसी को क्या नुकसान हो सकता है ?
  • सशक्त राष्ट्र निर्माण में बाधा
    यह एक स्वस्थ्य लोकतंत्र के विपरीत है कि राजनीति के चलते शिक्षा के मंदिर को सांप्रदायिक आग में झोंक दिया गया शिक्षण संस्थानों में छात्र, छात्राएं और शिक्षक, शिक्षिकाएं एक दूसरे के आमने सामने खड़े हैं इस माहौल से डर कर कुछ लड़कियों का स्कूल कॉलेज जाना उनके घरवालों ने बंद करवा दिया होगा. अब उन्हें हिजाब की इजाज़त मिले या न मिले, कुछ को आगे पढ़ने की इजाज़त शायद अब कभी नहीं मिलेगी. क्या वर्तमान परिस्थितियों में हम उस सशक्त राष्ट्र निर्माण के लक्ष्य की प्राप्ति कर पाएंगे जिसका सपना भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद ने स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राणों की आहुति देते हुए देखा था ?

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Raziq Ahmed Malik,
Founder & Secretary,
Yuva Parivartan Organization,
Chindwada

Raziq Ahmed Malik


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