युएन रिपोर्ट: भारतीय स्कूलों के बुनियादी स्वच्छता सुविधाओं में आई तेजी का रियलिटी चेक

आधिकारिक आंकड़ों में सरकार की नीतियों की सफलता होती है, जबकि ज़मीनी हक़ीकत सख्त होती है। यूनिसेफ का अनुमान है कि दुनिया के आधे से अधिक स्कूलों में अभी भी शौचालय, स्वच्छ पेयजल और स्वच्छता की कमी है|

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UN: Indian school sanitary check report
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संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने बताया कि स्कूलों में स्वच्छता संबंधी सुविधाएं बेहतर करने की दिशा में भारत ने तेजी से प्रगति की है| रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वर्ष 2000 से 2016 के बीच ऐसे स्कूलों की तादाद बहुत तेजी से घटी है जहां स्वच्छता संबंधी सुविधाएं बिलकुल नहीं हैं|

संयुक्त राष्ट्र एजेंसी के एक नए संयुक्त अध्ययन, ‘ड्रिकिंग वाटर, सैनिटेशन एंड हाईजीन इन स्कूल्स : 2018 ग्लोबल बेसलाइन रिपोर्ट’ में कहा गया है कि स्कूलों में अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं, सीखने के लिए स्वस्थ माहौल का आधार मुहैया कराती हैं| अब लड़कियों की मौजूदगी उस वक्त भी ज्यादा होगी जब वह माहवारी से गुजर रही होंगी|

आधिकारिक आंकड़ों में सरकार की नीतियों की सफलता होती है, जबकि ज़मीनी हक़ीकत सख्त होती है।

आधे से अधिक स्कूलों में शौचालय, स्वच्छ पेयजल और स्वच्छता की कमी : यूनिसेफ रिपोर्ट

यूनिसेफ का अनुमान है कि दुनिया के आधे से अधिक स्कूलों में अभी भी शौचालय, स्वच्छ पेयजल और स्वच्छता की कमी है| दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश का उदाहरण लें तो स्कूलों की ज़मीनी हक़ीकत मालुम होगी| आंकड़ों के मुताबिक इस राज्य में कुल 96,277 स्कूल हैं। रिपोर्ट में बताया गया कि 89% स्कूलों में शौचालय की सुविधा है जबकि राज्य शिक्षा विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि बच्चों को स्कूलों में दी जाने वाली सुविधाओं में से केवल 26 प्रतिशत लाभ मिल रहा है|

आंकड़ों के मुताबिक स्कूलों में शौचालय की पर्याप्त सुविधा नहीं है| पानी की कमी, शौचालय की सफाई या हाथ धोने की सामग्री उपलब्ध नहीं है। स्कूलों में शौचालयों की योजना बनाने, निर्माण और रखरखाव की प्रक्रियाओं से उत्तरदायित्व और पारदर्शिता गायब है| इससे मालुम होता है कि संविधान में उल्लेखित ‘शिक्षा के अधिकार’ के आवश्यक मानकों और मानदंडो का पालन नहीं हो रहा|

सफाई कर्मचारी नहीं

सी.आर.वाई (CRY) और उनके संगठनों द्वारा आयोजित माइक्रो-स्तरीय सर्वेक्षण के मुताबिक मध्यप्रदेश के 13 जिलों में 190 स्कूलों में सफाई कर्मचारियों की व्यवस्था नहीं है और इस कारण 49 प्रतिशत स्कूलों के शौचालयों का उपयोग नहीं होता है।

ऐसा ही हाल हरियाणा के कई स्कूलों का है जो सरकार की कमज़ोर नीतियों का उदहारण है|

शिक्षा विभाग के मुताबिक राज्य के ज़िलें में कुल 612 स्कूल है, जिसमें 333 सफाई कर्मचारी कार्य कर रहें हैं। 219 स्कूलों में सीनियर सेकेंडरी, हाई और मिडिल स्कूलों में बच्चों की संख्या के हिसाब से 513 सफाई कर्मचारियों होने चाहिए परन्तु 333 सफाई कर्मचारी ही कार्य कर रहें हैं। साथ ही पूरे ज़िलें में 392 प्राइमरी स्कूलों में कोई भी सफाई कर्मचारी नहीं है।

ऐसा ही हाल देश के अन्य राज्यों के स्कूलों का भी है|

लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विशेषकर लड़कियों के लिए अलग शौचालय बनाने का आह्वान किया था लेकिन देश में अभी भी करीब 19 प्रतिशत प्राथमिक स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था नहीं है। यह लड़कियों के पढ़ाई बीच में ही छोड़ने का एक अहम कारण भी है।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2012-13 में देश के 69 प्रतिशत स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था थी जबकि 2009-10 में यह 59 प्रतिशत थी।

राष्ट्रीय शिक्षा योजना एवं प्रशासन विश्वविद्यालय के आंकड़ों के मुताबिक राज्यों का हाल

2013-14 में आंध्रप्रदेश के 45,714 स्कूलों में से 9,114 स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय उपलब्ध नहीं था।

असम के 50,186 में से 6,890 स्कूलों, बिहार के 70,673 में से 17,982 स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं है।

गुजरात के 33,713 स्कूलों में से 87 स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं है जबकि कर्नाटक के 46,421 में से 12 स्कूलों और मध्यप्रदेश के 1,14,444 स्कूलों में से 9,130 स्कूल में अलग शौचालय की सुविधा नहीं है|

ओडिशा के 58,412 में से 8,196 स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था नहीं है।

तमिलनाडु के 37,002 स्कूलों में से 1,442 में और पश्चिम बंगाल के 81,915 स्कूलों में से 13,608 स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं है।

पानी की समस्या

देश के अधिकतर स्कूलों में आज भी नियमित साफ़-सफाई और पानी एक बड़ी समस्या है| सी.आर.वाई (CRY) द्वारा सर्वेक्षण के मुताबिक उत्तर प्रदेश के कई स्कूलों की हक़ीकत सामने आई है|

सर्वेक्षण के अनुसार उत्तर प्रदेश के 22 गांवों में लगभग इसी तरह की कहानी सामने आती है, जहां 28 प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में से 20 विद्यालयों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय है परन्तु पानी की सुविधा नहीं है।

सितंबर 2014 में केंद्र सरकार ने ‘स्वच्छ भारत स्वच्छ विद्यालय कार्यक्रम’ के तहत ‘स्कूलों में वाश (वाटर, सैनटैशन एंड हाइजीन) के लिए रोडमैप’ शुरू किया था जिसमें बच्चों के लिए अनुकूल और स्थायी सुरक्षित पीने के पानी पर ज़ोर दिया गया था लेकिन हक़ीकत यह है कि सरकार पानी के बुनियादी ढांचे की उपयोगिता को ट्रैक नहीं करती है| इसके साथ ही पानी और स्वच्छता पर विभिन्न सरकारी दस्तावेजों में इसका जिक्र नहीं होता।

ज़रूरत है स्कूलों में शौचालयों की योजना बनाने, निर्माण और रखरखाव की वाटर, सैनटैशन एंड हाइजीन जैसी बुनियादी सुविधाओं की प्रक्रियाओं में पारदर्शिता लाने की क्यूंकि सरकार की सुदृढ़ नीति और पारदर्शी प्रक्रिया से ही बच्चों के बेहतर भविष्य की कल्पना की जा सकती है|

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आधिकारिक आंकड़ों में सरकार की नीतियों की सफलता होती है, जबकि ज़मीनी हक़ीकत सख्त होती है। यूनिसेफ का अनुमान है कि दुनिया के आधे से अधिक स्कूलों में अभी भी शौचालय, स्वच्छ पेयजल और स्वच्छता की कमी है|
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The Policy Times
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